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मंगलवार, 6 सितंबर 2022

नीतीश कुमार का प्रधानमंत्री बनना संभव नहीं है, अगले छह महीने तक मुख्यमंत्री ही बने रह जाए तो बड़ी बात होगी



हरेश कुमार
जब भी बिहार का राजनीतिक इतिहास लिखा जाएगा, वहाँ यह मेंशन होगा कि अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर नीतीश कुमार ने भाजपा के नेताओं को भोज पर आमंत्रित कर थाली छीन ली. फिर, उन्हीं के साथ हो लिए और पांच साल बाद अचानक से याद आया कि अरे यह तो हमारी कोई बात मानता नहीं और दोबारा से फिर लालू प्रसाद यादव के साथ हो लिए.
एक कालिदास थे, जो जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे. नीतीश कुमार भी वही हैं. बिहार की राजनीतिक जटिलताओं को देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जॉर्ज फर्नांडिस की सलाह पर लालू प्रसाद यादव (यादव- मुसलमान वोट बैंक) के जंगलराज से मुक्ति के लिए कुर्मी-कोईरी के नेता नीतीश कुमार को आगे किया, ताकि लालू प्रसाद यादव के वोट बैंक का मुकाबला किया जा सके. नीतीश कुमार को यह गठबंधन अपने उपयुक्त लगा, नीतीश की नजर में तब भाजपा के लोग बहुत सही थे, क्योंकि उनका लक्ष्य लालू प्रसाद यादव एंड फैमिली के जंगलराज से मुक्ति दिलाना था और इसमें वो सफल रहे. भाजपा के कंधों पर सवार होकर और केंद्र सरकार में रेल व कृषि मंत्री के तौर पर नीतीश कुमार को खूब खाद-पानी मिला.
गोधरा कांड के समय यही नीतीश कुमार रेल मंत्री थे. नरेंद्र मोदी के भाजपा की ओर से पीएम कैंडिडट बनते ही वामपंथियों के चक्कर में असहिष्णुता (इन्टॉलरेंस) का मुद्दा बना कर इन्होंने भाजपा से नाता तोड़कर केंद्र में तीसरे मोर्चा का नेता बनने का सपना देखा था. राजनीतिज्ञ के तौर पर यह अधिकार सबको है, लेकिन जमीनी हकीकत समझे बिना कोई कदम उठाना आत्मघाती साबित होता है.
नीतीश कुमार और वामपंथी बुद्धिजीवी नब्बे के दशक में गठबंधन सरकार की मंशा पाले थे. तबसे अबतक गंगा में अरबों लीटर जल बह चुका था. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के बाद आई कांग्रेस सरकार हर मोर्चे पर फेल साबित हो चुकी थी. रिमोट कंट्रोल से संचालित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपना रुतबा पूरी तरह से खो चुके थे. इन सबके अलावा कांग्रेस और इससे निकली पार्टियों द्वारा मुस्लिम व ईसाई तुष्टिकरण की नीतियों से देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी त्रस्त हो चुकी थी.
गुजरात के गोधरा में सुनियोजित तरीकु से ट्रेन में आग लगाकर कारसेवकों को जिंदा जलाने की घटना से अंदर ही अंदर आक्रोशित थे. भीतर दावानल भड़क रहा था. बस एक मौका की तलाश थी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने देश की बहुसंख्यक आबादी को लह मौका दे दिया. नीतीश कुमार की पार्टी को चुनाव से पहले 22 सांसद थे, जो सीधे 2 पर सिमट गया. वामपंथियों ने अंदरखाने जल रहे नीतीश कुमार को लालू प्रसाद यादव के साथ लाने का सुनहरा मौका देखा और अपनी योजना को मूर्त रूप दे दिया. विधानसभा चुनाव में इसका फ़ायदा भी मिला. लालू प्रसाद यादव ने अपनी पुरानी गलतियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी. लोगों ने भी समझा कि एक चांस देने में क्या हर्ज है. सरकार बनने के साथ ही लालू प्रसाद यादव सबकुछ भूल गए और फिर से पुराने ठर्रे पर आ गये. राज्य में एकबार फिर से कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब होने लगी. सिवान जेल में लालू प्रसाद यादव की पार्टी के चार मंत्री शहाबुद्दीन से मिलने गये थे. इसकी फोटो दैनिक हिन्दुस्तान के सिवान ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन ने बाहर कर दी. शहाबुद्दीन ने अपने साथियों से राजदेव रंजन की हत्या करवा दी. फिर, क्या था. राज्य में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये. इसी बीच लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने पर जोर देने लगे थे, तब हार- दार कर नीतीश कुमार वापस भाजपा के साथ आ गये थे.
इससे पहले जॉर्ज फर्नांडिस शरद यादव से लेकर न जाने कितने नेताओं को नीतीश कुमार ने जलील किया था. अब वे पुराने नीतीश कुमार नहीं रह गये थे. भाजपा का नया नेतृत्व नीतीश कुमार को ज्यादा तवज्जों नहीं दे रहा था. नीतीश कुमार ने उपराष्ट्रपति बनाने के लिए हरसंभव कोशिश करके देख लिया. जब कोई दाल न गली तो फिर से लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ हो लिये.
विगत में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी से लेकर कांग्रेस के कितने ही नेताओं को जदयू में शामिल किया था. तब यह लोकतंत्र था. तेजस्वी ने ओवैसी की पार्टी के पांच में से चार विधायक तोड़ लिए, तब वैचारिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मजबूती कही गई. भाजपा ने उत्तर-पूर्व मणिपुर में जदयू के विधायकों को अपने में मिला लिया तो यह लोकतंत्र को कमजोर करने वाला कदम है. इसकी आलोचना अशोक चोधरी कर रहे हैं, जो कल तक कांग्रेस पार्टी की राज्य ईकाई के अध्यक्ष थे और अब जदयू के साथ हैं.
नीतीश कुमार अगले छह महीने तक मुख्यमंत्री ही बने रह गए तो यह बड़ी बात होगी. प्रधानमंत्री का ख्वाब इस जन्म में पूरा होने से रहा.

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