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मंगलवार, 6 सितंबर 2022

जिला बनने के 28 साल बाद आखिरकार शिवहर को अपना ब्लड बैंक मिल गया!

हरेश कुमार




शिवहर जिला बनने के 28 साल बाद जिला में ब्लड बैंक की स्थापना हुई है। इससे पहले न जाने कितने ही लोग ब्लड बैंक के अभाव में असमय दुनिया से चल बसे। जनप्रतिनिधियों को कोई शर्म तक नहीं, क्योंकि इन सबको सरकार की कृपा से सारी सुविधाएं मुहैया हो जाती हैं। 

किसी भी जिला के विकास में 28 साल एक लंबा समय होता है। इस लिहाज से देखें तो शिवहर जिला को अभी लंबा सफर तय करना है। जाति-बाहुबल, दो नंबर के पैसे पर जीतने वाले यहां के बेशर्म जनप्रतिनिधियों को शिवहर के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। अन्यथा बागमती नदी की बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित शिवहर जिला को आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। शिवहर में मूलभूत सुविधाओं की आज भी भारी कमी है।

पिछले 40 सालों में शिवहर जिला के बेलवा-नरकटिया और मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) के देवापुर गांव के बीच भूमि सर्वेक्षण का काम नहीं हो सका है। बेलवा का डैम आजतक अधूरा है। हर साल इसे बाढ़ से पहले पूरा करने का वादा किया जाता रहा है।

बागमती नदी की बाढ़ से प्रभावित इस जिला में पुल-पुलियों की भारी कमी है।

शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, बिजली, पानी और रोजगार के बारे में कोई चर्चा न की जाए वही अच्छा है। बिहार सरकार की कृपा से कुछ स्कूलों में भवन जरूर बन गए हैं, लेकिन वहां की पढ़ाई कैसे होती है, सबको पता है। जिसके पास भी थोड़ा-सा पैसा है, वह अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाता। शिवहर में मेधावी छात्रों की कोई कमी नहीं है। यहां के बच्चे हर एग्जाम में बैठते हैं और अपनी मेहनत व प्राइवेट ट्यूशन-कोचिंग के बलबूते सफल भी होते हैं। चाहे वो आईआईटी की परीक्षा हो या मेडिकल की या अच्छे स्कूलों में एडमिशन के लिए पांचवीं क्लास के बाद होने वाली परीक्षा।
आज की तारीख में भी शिवहर स्थित सरकारी डिग्री कॉलेज में विज्ञान के पढ़ाई की कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है। प्रयोगशाला के नाम पर मजाक है और कुछ नहीं। नामांकन और एग्जाम के समय कॉलेज में भीड़ होती है। बाकी समय बच्चे भटकते रहते हैं। इसके दोषी शिवहर के लोग भी हैं, जो जाति के नाम पर या पैसे लेकर बाहुबलियों और अपराधियों के संबंधियों को अपना बहुमूल्य वोट देकर जीताते रहे हैं। 

शिवहर की लचर कानून-व्यवस्था के कारण पड़ोसी देश नेपाल से शराब, गांजा व हथियारों की तस्करी खुलेआम होती रही है। यहां नक्सली गतिविधियों में तेजी आई है।

बिहार का सबसे छोटा जिला शिवहर में कब एके-47 गरज जाए, कोई नहीं जानता है। अपराध के मामले में यह बड़े-बड़े शहरों को मात देता रहा है। मूंछ पर ताव देने और अपने जाति के जनप्रतिनिधियों को जीताने के लिए यहां के लोग किसी भी स्तरतक गिर जाते हैं। इस बारे में जितना लिखा जाए, कम है। ऐसा नहीं है कि यहां पर काबिल लोग नहीं हैं। एक से बढ़कर एक समाजसेवी शिवहर की धरती पर पैदा हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई मौका नहीं देना चाहता। दुर्भाग्य इस बात का है कि शिवहर को अपना जनप्रतिनिधि आयात करना पड़ रहा है। जो व्यक्ति शिवहर में पैदा हुआ नहीं, जिसका शिवहर से कोई लेना-देना नहीं. उसे क्या मतलब शिवहर की समस्याओं से। हां, वोट लेने के लिए वह लंबे-चौड़े वादे कर देता है। बाढ़ के समय तीन से चार महीने तक यह जिला राज्य के अन्य भागों से कटा रहता है।

शिवहर जिला बनने के बाद से ही यहां के लोग रेल सेवाओं से वंचित हैं। रेल सेवा के लिए यहां के लोगों को पूर्ववर्ती जिला सीतामढ़ी, मोतिहारी (पूर्वी चंपारण), मुजफ्फरपुर या पटना जाना होता है। यहां के जनप्रतिनिधियों को कोई शर्म नहीं आती। शिवहर की मौजूदा सांसद रमा देवी ने थोड़ा-सा भी प्रयास किया होता तो आज शिवहर में रेल दौड़ रही होती। इनके साथ ही झारखंड के गोड्डा से निशिकांत दुबे सांसद हैं और दोनों अपने-अपने क्षेत्र से लगातार जीतते रहे हैं। रमा देवी के क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है तो निशिकांत दुबे के क्षेत्र में एम्स, हवाई अड्डा, हाईवे से लेकर रेलवे की बेहतरीन सुविधाएं जनता को प्राप्त है। दोनों भाजपा से ही हैं और दोनों लगातार तीसरी बार जीते हैं। वैसे निशिकांत दुबे से रमा देवी की तुलना करने ही बेकार है। सदन में रमा देवी की बात कोई सुनता नहीं। 
लोकसभा चुनाव 2019 से पहले जाति के नाम पर मोदी और शाह की जोडी ने फर्जी तरीके से इन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला संसद का पुरस्कार दे दिया। अपने दम पर इस बार चुनाव नहीं जीत पाती तो राजपूतों को वाट लेने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भेजकर लवली आनंद के साथ  बार्गेनिंग की गई थी। यहां के लोग राजनाथ सिंह के बातों में आ गए और मिला इनको बाबा जी का ठुल्लू। रमा देवी से कोई शिकायत नहीं है। आप काम तो कराइए। सिर्फ बातों से कुछ नहीं होता है। शिवहर के लोगों अगर आपको अपनी ही जाति का उम्मीदवार जीताना है तो बेहतर व्यक्ति को खड़ा करो न। जरूरी है कि एक ही व्यक्ति को वोट दो, जिसकी उपलब्धि नील बटा शून्य है। इतना काम तो गांव का एक मुखिया भी करा सकता है, बशर्ते कि उसके हाथ में पावर हो। 

विधायक चेतन आनंद की सक्रियता चुनाव के दौरान ही देखी गई। काम के नाम पर अबतक कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। समाचारपत्रों में कुछ छपा है, लेकिन धरती पर जबतक न हो, सब बेकार है। शिवहर जिला अस्पताल की सड़क बनाकर उन्होंने कोई बड़ा अहसान नहीं कर दिया। शिवहर को लंबा सफर तय करना है और यह तभी संभव होगा, जब आप योग्य व्यक्ति को जीताओगे, आप किसी भी जाति का उम्मीदवार घोषित करो, इससे कोई फर्क नहीं है। उम्मीदवार स्थानीय हो और वह आपके दुख-सुख में साथ खड़े होने की क्षमता रखता हो, न कि डर-भय के कारण आप उसके आगमन पर पलक-पांवड़े बिछा रहे हों। अभी यही हो रहा है। एक ब्लड बैंक के लिए 28 साल लग गए और इसे आप अपनी उपलब्धि बता रहे हो। शर्म नहीं आती आप सब जनप्रतिनिधियों को।

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