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सोमवार, 28 नवंबर 2022

मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम है

 हरेश कुमार



आज के समय में मनुष्य समय और परिस्थितियों का गुलाम है। कई बार परिस्थिति ऐसी आ जाती है कि वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता। वह स्थिति का गुलाम बनकर रह जाता है। मनुष्य ने तमाम तरह के खोज किए हैं। अपनी जरूरतों के अनुसार, तमाम बदलाव किए हैं। यह मनुष्य ही है, जिसने प्रकृति के विरुद्ध जाकर तमाम कार्य किए और आज उसका परिणाम भी उसे ही भुगतना पड़ रहा है। 

बचपन में माता-पिता की छांव में हम सभी न जाने कितने सुहाने सपने देखते हैं। कुछ भाग्यशाली लोग होते हैं, जिनके सपने पूरे भी होते हैं। वहीं, कुछ ऐसे भी अभागे होते हैं, जो हर तरह से सक्षम होने के बावजूद अपने सपनों को कभी पूरा नहीं कर पाते हैं। यहीं से वो भाग्य का रोना शुरू कर देते हैं। इसमें कुछ सच्चाई तो कुछ परिस्थिति की मजबूरी होती है।

आगे चलकर परिवार बढ़ता है। परिवार आपके अनुसार हुआ तब तो दिन-रात कब पंख लगाकर उड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता, लेकिन अगर आपका परिवार आपकी सोच के विपरीत हुआ तो जीवन काटना मुश्किल पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में आदमी दोहरा जीवन जीने की कोशिश करता है, लेकिन वह सफल नहीं हो पाता। दोहरा जीवन जीना सबके वश की बात भी नहीं। आखिर, वह भी तो इंसान है और उसकी भी अपनी इच्छा-आकांक्षाएं हैं। पत्नी, बच्चों से लेकर सगे-संबंधियों की जरूरतों को पूरा करने वाला वह व्यक्ति जब अपने बारे में, अपनी इच्छाओं के बारे में सोचता है, तो उस पर स्वार्थी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। हां, वो जब तक सबके लिए अपनी खुशियों की कुर्बानी दे रहा है, तब तक उससे अच्छा व्यक्ति कोई नहीं। 

परिवार चाहे एकल हो या संयुक्त हर जगह यह समस्या बनी हुई है। उदारीकरण से पहले अधिकांश परिवार संयुक्त हुआ करते थे,लेकिन उदारीकरण और नौकरी की मजबूरी ने पहले तो लोगों को गांव-घरों से अलग किया और फिर अंजान-से शहरों में ला पटका, जहां कोई अपना नहीं। कहने को शहर में सभी थे, लेकिन किसी के पास फुर्सत नहीं। फुर्सत हो भी तो कैसे। सबको रोजी-रोटी कमाने की पड़ी है और हर कोई पैसे के जंजाल में फंसा पड़ा है। सबकी अपनी मजबूरी और अपनी कहानियां हैं। ऐसी स्थिति में कुछ नापाक लोग आपकी परिस्थितियों का नाजायज फायदा उठाते हैं और ऐसा करने वाले ज्यादातर आपके अपने ही होते हैं। इतिहास गवाह है कि पीठ में खंजर घोंपने वाले वो लोग होते हैं, जिन पर आप सबसे अधिक भरोसा करते हैं। इसके बाद शुरू होता है घात-प्रतिघात का सिलसिला। 

बच्चै जैसे ही बड़े होते हैं उनके अपने नखरे शुरू होने लगते हैं। बच्चों से भी मां-बाप व समाज की अपनी उम्मीदें होती हैं, लेकिन जब वही बच्चे आपसे कह दे कि यह मेरी जिंदगी है और मैं अपनी जिंदगी के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हूं, तब आपके पैरों तले जमीन खिसक जाता है। आप सोचते हैं कि धरती फट जाए और आप उसमें समां जाएं या या आसमान फट जाए और आप उसमें समाहित हो जाएं। यह ऐसी स्थिति होती है कि जिसे हर कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं होता।

आज के समाज में महानगरों की भागदौड़ और व्यस्तता भरी जिंदगी में अवैध संबंधों ने परिवार को तोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। एक ही झटके में आपको पता लगता है कि जिस पर भरोसा करके आपने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, वह तो किसी और के साथ बिस्तर पर तथाकथित सुहाने सपने बुन रही थी। यह अब सामान्य बात हो चली है। जिसने इस सच्चाई को जान लिया , वह बुद्ध को प्राप्त कर लेता  है या फिर अवसाद में घिरकर अपने आप या परिवार को खत्म कर लेता है। महानगरों में आए दिन होने वाले अपराधों के पीछे यह एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। 

समाज के अग्रणी लोगों और मनोवज्ञानिकों को इस समस्या पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। समय रहते अगर इस पर ध्यान न दिया गया तो आने वाले समय में यह समस्या कैंसर से भी बड़ा रूप ले लेगी और तब शायद हमारे-आपके कंट्रोल से बाहर हो जाए। हर बीमारी का इलाज है और वैज्ञानिक एड्स जैसी बीमारी का भी दवा खोजने में लगे हुए हैं। वहीं, अवैध संबंध समाज में एक ऐसी बीमारी है, जिसका कोई इलाज अब तक नहीं खोजा गया है। यह तब से है, जबसे पृथ्वी पर मनुष्य है और आगे भी रहेगा। परिवार से इतर यौनसुख खोजने की लालसा आदमी या औरत को कहीं का नहीं छोड़ता। थोड़े समय के यौन सुख के चक्कर में अच्छा-खासा परिवार टूट जाता है। कुछ समय पहले तक जिस परिवार की समाज में एक प्रतिष्ठा होती है, वह परिवार खत्म हो चुका होता है। सारे सपने टूट जाते हैं। समय रहते संभल जाए और अपनी गलतियों को मान लें तो परिवार के बचने की कुछ हद तक संभावना होती है। हालांकि, एक बार विश्वास टूट जाए तो दोबारा वह विश्वास कायम नहीं होता। 

रहीम कवि ने वर्षों पहले लिखा थाः रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए, टूटै पर फिर ना जुड़ै, जुड़ै गांठ पड़ जाए। विश्वास चीज ही ऐसी होती है कि आदमी पर्वत को भी लांघ जाता है। पत्थर को भी भगवान मानकर पूजता है और वह फलीभूत होता है। वहीं, विश्वास चटक जाए तो आप लाख कोशिश कर लो, आपकी जिंदगी पटरी पर दोबारा नहीं आ सकती है। व्यक्ति कितना भी बीमार हो, उसके अंदर आत्मविश्वास है तो वह हर तरह की बीमारी से पार पा जाता है,लेकिन जैसे ही उसका आत्मविश्वास खत्म हुआ, फिर डॉक्टर कितना भी कोशिश कर ले, उसे बचा नहीं सकता। बड़े-बुजुर्गों ने कहा है कि दवा से ज्यादा दुआ काम करती है। यहां भी एक तरह का विश्वास ही है।

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