हरेश कुमार
जिंदगी भर कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के लिए काम करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी मोदी और शाह के पीछे 2014 के बाद से ही पूरी ताकत से लगे हुए हैं. इन सबने 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की संज्ञा दी थी. इन सबने एक सोची-समझी और योजनाबद्ध राजनीति के तहत विदेशों में भारत की छवि खराब करने के लिए इन्टॉलरेंस (असहिष्णुता) का मुद्दा उठाते हुए अवॉर्ड्स रिटर्न की नौटंकी शुरू की. इन्हें लगा कि ये जनमानस को पहले की तरह बेवकूफ बना लेंगे.
2015 में बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की पार्टी के बीच महागठबंधन करा दिया. इसका अच्छा परिणाम इन्हें चुनाव में मिला और ये फूल के बेंग हो गये. कुआँ के मेंढक तो पहले से थे. बिहार के विधानसभा चुनाव में जीत मिलने के बाद से इन सबके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. सब भीतर ही भीतर केंद्र सरकार को उखाड़ने और अपने पुराने राजनीतिक वैभव को वापस लाने के दिवास्वप्न देखने लगे थे. इन सबको लगा कि बस अब कुछ समय की बात है. अगले चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करने में सफल हो जाएंगे. इन सबकी बैठकों में ठहाके गूंजने लगे थे. फंडिंग तेज हो गई थी. इससे उत्साहित होकर 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले इन सबने मायावती और मुलायम की पार्टी के बीच गठबंधन करा दिया. जातिगत समीकरणों को देखते हुए इनकी जीत सुनिश्चित लग रही थी. नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो रहा था. विपक्षी खेमे में चहुंओर उल्लास का माहौल था. सभी ने चुनाव परिणाम से पहले ही शेरवानी सिलवा ली थी. बिहार में मिली प्रत्याशित सफलता से सभी उत्साहित थे. इन सबने दूसरे पक्ष यानी भाजपा की तैयारियों को हल्के में लिया. इसके पीछे इन सबका अति आत्मविश्वास और पूर्व के चुनावों के आंकड़े थे. जातिगत समीकरण भी तथाकथित बुद्धिजीवियों के पक्ष में लग रहा था.
भाजपा को केंद्रीय सत्ता से बाहर लाने की इनकी मंशा सबल होती दिखाई दे रही थी. यहीं पर ये गच्चा खा गये.इन सबने दूसरे पक्ष की तैयारी को बहुत हल्के में लिया था. इन्हें यह नहीं पता कि यह हिन्दुस्तान है और यहाँ कोस-कोस में भाषा बदले और चार कोस में पानी. यहाँ जमीनी हकीकत यह है कि एक भाई को आगे बढ़ते देखकर दूसरा भाई उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता है और दिनरात उसकी बर्बादी के लिए हर उस शख्स से हाथ मिलाने को तैयार रहता है, जो भाई के खिलाफ हो. उसे यह कभी स्वीकार नहीं होता कि है तो वो मेरा भाई है. इस चक्कर में अपने संबंध को तो खराब करता ही है. सामाजिक तौर पर भी विद्वेष फैलाने का काम करता है.अंतत: इस पूरे प्रकरण में वह अपनी जगहंसाई करा बैठता है. तथाकथित बुद्धिजीवियों की स्थिति ठीक वैसी ही है. इनकी इज़्ज़त दो कौड़ी की भी नहीं रह गई है.
विपक्षी पार्टियों की रणनीति से हमें 1965 का भारत- पाक युद्ध याद आ गया. इससे पहले 1962 में चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंकने का काम किया था. यह सब नेहरू की वामपंथियों पर अत्यधिक भरोसे और रक्षामंत्री वीके कृष्ण मेनन द्वारा भारतीय सैनिकों की जरूरतों की अनदेखी करने का परिणाम था. इसका फायदा उठाते हुए चीन ने एकतरफ नेहरू की आंखों में धूल झोंकने का काम किया और दूसरी तरफ हिंदी चीनी भाई- भाई का नारा देते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया. भारत का नेतृत्व पंचशील के सिद्धांत पर आंख मूंदकर बैठा था, जबकि उसे तो 1959 में ही सचेत होकर चीन का तब प्रतिकार करना चाहिए था, जब चीन ने भारत के पड़ोसी तिब्बत पर आक्रमण कर बलपूर्वक उस पर कब्जा कर लिया था, लेकिन वामपंथियों के पूरी तरह कब्जे में रहे नेहरू ने इस पर पूरी तरह चुप्पी साध ली. इसका दुष्परिणाम अगले तीन साल में ही मिल गया, जबकि चीन भारत से एक साल बाद आजाद हुआ था. उसकी अर्थव्यवस्था भारत से कमजोर थी. 1955 में चीन के राष्ट्रपति ने विदेशी दौरे के लिए भारत सरकार से एयर इंडिया का विमान किराये पर लिया था. 1962 में चीनी आक्रमण के समय अगर भारतीय वायुसेना को युद्ध में उतार दिया जाता तो परिणाम भारत के पक्ष में होते, लेकिन वामपंथियों ने ऐसा होने नहीं दिया. वामपंथियों के प्रभाव के कारण ही नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता चीन को थाली में सजाकर दे दिया था. इसके बाद चीन की स्थिति वैश्विक स्तर पर मजबूत होती चली गई और उसका परिणाम भारत आजतक भुगत रहा है. चीन भारत के सबसे बड़े दुश्मन पाकिस्तान को हर तरह से मदद करता है. इस मदद के चक्कर में पाकिस्तान भले बर्बाद होने के कगार पर आ चुका हो. पाकिस्तान की सेना और वहाँ के राजनीतिक नेतृत्व को कोई फर्क नहीं पड़ता.
1962 में भारत कई पराजय से पाकिस्तान में खुशियों का माहौल था. इसी के तहत वह अंदर ही अंदर भारत से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता था. अमेरिका उसकी इस तैयारी में साथ था. चीन का आशीर्वाद था ही. अमेरिका से मिले पैंटन टैंकों की बदौलत पाकिस्तान के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उसने योजना बनाकर भारत पर आक्रमण कर दिया. पाकिस्तान को लगा कि नेहरू की मृत्यु के बाद भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत कमजोर है. ठिगने कद के लालबहादुर शास्त्री की स्थिति का आकलन करने में पाकिस्तान और उसके समर्थक देशों ने भारी भूल कर दी.
लालबहादुर शास्त्री ने नेहरू के उलट भारत की सेना को फ्री हैंड दे दिया और खुद युद्ध के मैदान में जाकर जय जवान, जय किसान का नारा दिया. भारत की महिलाओं ने सेना के लिए अपने-अपने आभूषणों को समर्पित कर दिया. लोग एक समय खाने लगे. यह सब लालबहादुर शास्त्री जैसे ईमानदार नेता की एक आवाज़ पर हुआ. भारत कई सेना लाहौर तक पहुँच चुकी थी. इससे अमेरिका और अन्य देशों में खलबली मच गई और सभी ने मिलकर युद्ध विराम करवा दिया.तत्कालीन सोवियत संघ के ताशकंद में समझौता के नाम पर लालबहादुर शास्त्री को बुलाकर सबने उनकी हत्या करा दी. भारत की राजनीति में सत्तालोलुप इंदिरा गांधी ने तब सबसे बड़ा षडयंत्र रचा और बिना पोस्टमॉर्टम के शास्त्री जी का अंतिम संस्कार करवा दिया. यह सब लिखने के पीछे एकमात्र उद्देश्य विपक्षी दलों के उतावलेपन और केंद्र की सत्ता से भाजपा को हटाने के दिवास्वप्न पर प्रकाश डालना है. 2015 बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम आने के साथ ही भाजपा नेतृत्व उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में अपने आप को झोंक दिया था.
2017 का चुनाव परिणाम आते ही सबको सांप सूंघ गया. सबने एकमत से ईवीएम पर आरोप मरना शुरू कर दिया, जबकि हकीकत सबको पता है. यह सब होने का कारण विपक्षी भाजपा की तैयारियों का सही आकलन न करना या उसे कम आंकना मुख्य कारण रहा. जैसा कि पाकिस्तान के नेतृत्व ने 1962 में चीन की सफलता से उत्साहित होकर 1965 में किया था. ठीक उसी तरह बिहार की सफलता से अतिउत्साह में आकर सबने उत्तर प्रदेश में भी यही परिणाम आने का भरोसा कर लिया था. यह जाने बिना कि भाजपा के नेता भी अपने स्तर पर लगे हुए हैं. भाजपा के चुनावी रणनीतिकार अमित शाह को ऐसे ही नहीं चाणक्य की संज्ञा दी गई है.
सो, बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की पार्टी के बीच महागठबंधन हो जाने से इसका प्रभाव अन्य जगहों पर पड़ेगा इसे गारंटी न मान लें. अभी तो सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) एन आर सी से लेकर जनसंख्या नियंत्रण जैसे तमाम तुरुप का पत्ता केंद्र सरकार के हाथ में है, जो एक ही झटके में सारे समीकरणों को ध्वस्त करने के लिए काफी है.

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