हरेश कुमार
विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों में जदयू के नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पहले तृणमूल कांग्रेस की फायर ब्रांड नेता व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दम ठोककर मैदान में है तो महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहे शरद पवार हमेशा की तरह पीएम पद पर घाघ की तरह नजरें गड़ाए रहते हैं। वहीं, खालिस्तानियों की मदद से पंजाब में सफलता के बाद से आप आदमी पार्टी के नेता औऱ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को लगता है कि उनके नाम पर सहमति बन जाएगी तो दक्षिण भारत से तेलंगाना के मुख्यमंत्री और टीसीआर नेता केसीआर बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का सपना देखते रहते हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती भी अंदर ही अंदर पीएम पद के लिए सपने बुनती रहती हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी किसी से कम नहीं हैं।
इन सबसे अलग राहुल गांधी के नाम पर कांग्रेस में सोनिया गांधी एंड वफादार मंडली अशोक गहलोत और भूपेश बघेल आदि चरणवंदना में लगे रहते हैं। सोनिया गांधी एंड वफादार मंडली राहुल गांधी के नाम पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं, जबकि आने वाले दो दशक तक अभी भाजपा में ही मोदी नंबर वन पोजिशन पर बने हुए हैं। ये हाल तब है, जब प्रधानमंत्री के लिए कोई वैकेंसी नहीं है।
दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा लिए लालू प्रसाद की पार्टी से दोबारा गठबंधन करके नीतीश कुमार ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। भाजपा में जो भी थोड़ी-बहुत रही-सही इज्जत बची थी, लालू प्रसाद एंड फैमिली के साथ दोबारा से गठबंधन के बाद वो भी जाती रही। अब वो किस मुंह से सुशासन की बात करेंगे। हालात ऐसे बन रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनना तो दूर की बात, वो कुछ दिनों के बाद मुख्यमंत्री का पद भी गंवा बैठेंगे। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) जैसी मृत हो चुकी पार्टी को नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हुए जिंदा कर दिया था। लालू प्रसाद का करिश्मा जा चुका था, लेकिन जदयू के साथ महागठबंधन के बाद लालू की जेबी पार्टी को तो जैसे नया जीवन मिल गया। आज लालू प्रसाद एंड पार्टी की जो भी हालत है, वह 2015 में नीतीश कुमार के साथ महागठबंधन के कारण है। लालू प्रसाद हर हाल में फायदे में रहे और नीतीश कुमार हर स्थिति में कहीं के नहीं रहे।
नीतीश कुमार की सोच के पीछे 1989 के बाद से केंद्र में गठबंधन सरकारों का चला दौर था, जहां मात्र 16 सांसदों के बूते देवगौड़ा 11 महीने तक प्रधानमंत्री बने गए तो पांच-छह सांसदों के बलबूते रामवलास पासवान हर सरकार में मलाईदार पदों पर बने रहे।
केंद्र में पिछले लगभग ढाई दशक से अधिक समय से राजनीतिक ट्रेंड को देखते हुए नीतीश कुमार और उनके समर्थकों को ऐसा विश्वास हो चला था कि 22 सांसदों को ही अगर हम रिपीट कर गए और केंद्र में एकबार फिर से मिलीजुली पार्टी यानी गठबंधन की सरकार बनी तो अगर प्रधानमंत्री न भी बनें तो केंद्र की सरकार में बड़े मंत्रिमंडल यथा रेल मंत्रालय, कृषि मंत्रालय जैसे विभाग अपने लोगों को देकर सरकार को नियंत्रण में रखेंगे, लेकिन विधि की विडंबना देखिए कि नीतीश कुमार की स्थिति काटो तो खून नहीं वाली होकर रह गई। 22 सांसदों वाली पार्टी से नीतीश कुमार सीधे औंधे मुंह जमीन पर आ गिरे और उनकी पार्टी को मात्र दो सांसद मिले और श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल गया, जिसका किसी भी विपक्षी नेता को अनुमान नहीं था या वो जानबूझकर जनता की पसंद को मानने से इनकार कर रहे थे। कुछ ही दिनों के बाद तथाकथित असहिष्णुता का नारा लगाकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने अवॉर्ड रिटर्न का खेल खेला और नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद की जोड़ी बनवा दी। बनवाने को तो इन सबने आगे चलकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान में अखिलेश यादव और मायावती के बीच भी गठबंधन बना दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश में वैसी सफलता न मिली, वरना ये सभी 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा दिए गए नारे शाइनिंग इंडिया वाली हालत को दोहराने को तैयार थे।
बिहार में महागठबंधन को उम्मीद के मुताबिक, राजनीतिक सफलता मिली, लेकिन जैसा कि सभी को आशंका थी, सरकार गठन के कुछ समय बाद ही लालू प्रसाद यादव एंड फैमिली नीतीश कुमार पर हावी होने लगी। लालू यादव और राबड़ी देवी हर हाल में तेजस्वी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाह रहे थे और इसके लिए वो आधा-आधा टर्म की बात सार्वजनिक मंचों से कहने लगे। उधर, महागठबंधन की सरकार बनने का दुष्परिणाम दिखने लगा था। बिहार के हर जिले में एक बार फिर से अपराधियों ने सिर उठाना शुरू कर दिया था। तब सिवान जेल में बंद बाहुबली नेता शहाबुद्दीन (कोरोना के दौरान मृत) से मिलने राजद के चार मंत्री गए थे और इन सबकी मुलाकात की फोटो बाकायदा हिन्दुस्तान के सिवान ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन ने अपने समाचारपत्र में प्रकाशित करवा दिया। नतीजा उन्हें गोलियों से भून डाला गया। शुरुआत में नीतीश कुमार ने सरकार का बचाव करने की कोशिश की, लेकिन वो बचाव न कर सके और देखते ही देखते ढाई साल में ही फिर से वापस भाजपा के साथ आ गए।
भाजपा में रिटर्न होने के बाद नीतीश कुमार पहले वाली स्थिति में सौदेबाजी करना चाहते थे, जो भाजपा के नए नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को कदापि मंजूर नहीं था। वो कभी केंद्रीय मंत्रिमंडल में ज्यादा हिस्सेदारी को लेकर भाजपा से नाराज रहे तो कभी उपराष्ट्रपति बनने को लेकर, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने इनको गंभीरता से लेना छोड़ दिया था। इसे देखते हुए नीतीश कुमार ने एक बार फिर से लालू प्रसाद की पार्टी के साथ गठबंधन में जाना बेहतर समझा।
हालांकि, आने वाला वक्त बताएगा कि यह गठबंधन कितने दिनों तक चलेगा। शुरुआती रुझानों को देखते हुए इसकी सफलता पर संदेह होना शुरू हो गया है। लालू परिवार आदतन एक बार फिर से सत्ता पर हावी होना शुरू हो चुका है। हालांकि, इतनी जल्दी कुछ कहना या लिखना ठीक नहीं, लेकिन संकेत बता रहे हैं कि दोनों पार्टियों के बीच सामंजस्य में काफी कमी है। राजनीतिक विश्लेषक तो यहां तक कहने लगे हैं कि कुछ ही महीनों में नीतीश कुमार की पार्टी को तोड़कर लालू प्रसाद अपने पुत्र तेजस्वी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा देंगे और ऐसा हो तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं। बिहार की राजनीति एक बार फिर से करवट लेने को तैयार है।

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