पेज

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के असली हीरो सैम मानेक शॉ डॉक्टर बनना चाहते थे,लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था

हरेश कुमार 



सैम मानेक शॉ का जन्म 3 अप्रैल, 1914 को पंजाब के अमृतसर में पारसी माता-पिता के यहाँ हुआ था। उनके पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे। वह भी डॉक्टर बनना चाहते थे,लेकिन पिता इंग्लैंड भेजने को तैयार नहीं थे। अपने पिता द्वारा मेडिकल की पढाई के लिए इंग्लैंड भेजने से इनकार करने के खिलाफ विद्रोह स्वरूप, मानेक शॉ ने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में प्रवेश के लिए आवेदन किया। प्रतियोगिता के माध्यम से चुने गए 15 कैडेटों में से वह छठे स्थान पर थे। वह और अन्य कैडेट 1932 में IMA में प्रशिक्षित होने वाले पहले बैच का हिस्सा थे।

सैम मानेक शॉ डॉक्टरी की पढ़ाई करना चाहते थे मगर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। वह भारत के पहले फाइव स्टार फील्ड मार्शल बने। इसके अलावा साहस और चतुराई से उन सभी युद्धों में अग्रणी रहे, जिनका वह हिस्सा रहे थे। चार दशकों की सेवा में उन्होंने पाँच युद्धों में भाग लिया द्वितीय विश्व युद्ध, 1947 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1962 का चीन-भारत युद्ध, 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 का बांग्लादेश मुक्ति युद्ध। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 



भारतीय सेना में सैम मानेकशॉ का कार्यकाल अद्वितीय रहा है। उनका प्रतिष्ठित सैन्य करियर ब्रिटिश भारतीय सेना से जुड़े रहने से लेकर, द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने और पांच युद्धों के साथ चार दशकों तक रहा है। वह पहले भारतीय सेना अधिकारी हैं, जिन्हें फील्ड मार्शल के सर्वोच्च पद पर पदोन्नत किया गया।

दूसरे विश्व युद्ध में लगी थी 7 गोलियां

दूसरे विश्व युद्ध के समय भारत आजाद नीं हुआ था। तब भारत के सैनिक अंग्रेजों की सेना के लिए लड़ा करते थे। सैम मानेक शॉ ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कैप्टन थे। वह उस समय जापान आर्मी के खिलाफ अपने जवानों का नेतृत्व कर रहे थे। 1942 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एख जापानी सैनिक ने उन्हें सात गोलियां मारी थी, जो उनके आंत, जिगर और गुर्दों में लगी थी। परिस्थितियां ऐसी बनी थी कि सैम के बचने के चांस बहुत कम रह गए थे,लेकिन उस समय भी वह युद्ध के मैदान में डटे रहे थे। जब उन्हें डॉक्टर के पास ले जाया गया और डॉक्टर ने उनसे पूछा कि क्या हुआ है, तब सैम का जवाब था- मुझे खच्चर ने लात मारी है।

मानेक शॉ 1969 में भारतीय सेना के 8 वें चीफ ऑफ स्टाफ बने थे। उन्हें सैम बहादुर के नाम से जाना जाता था। उनके इस नाम सैम बहादुरके पीछे की भी एक रोचक कहानी है।

मानेकशॉ चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ थे और गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों से मुखातिब थे उस समय उन्हें लोग सैम के नाम से ही ज़्यादा जानते थे। उनके पूरे नाम से उन्हें सम्बोधित नहीं किया जाता था। उन्होंने एक गोरखा से पूछा- क्या तुम मेरा नाम जानते हो?” सिपाही ने हाँ में जवाब दिया तो मानेक शॉ ने पूछा मेरा नाम क्या है? जवाब मिला- सैम उन्होनें पूछा आगे? तब घबराहट में उस गोरखा ने कहा- बहादुरयह सुन कर सभी हंस पड़े खुद मानेक शॉ भी और उनका नाम सैम बहादुर पड़ गया।

इसी गोरखा रेजिमेंट के बारें में उन्होंने कहा था- अगर कोई यह कहता है कि वह मरने से नहीं डरता है तो दो बात हो सकती है - या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर वो एक गोरखा है।

बांग्लादेश का उदय

सैम की सैन्य कुशलता की पहचान उस समय हुई, जब भारत ने पश्चिम पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी विद्रोहियों की मदद करने का फैसला किया। भारत उस समय उपलब्ध गोला-बारूद और सैनिकों के आधार पर तैयार नहीं था। सैम मानेक शॉ ने प्रधानमंत्री के साथ बैठक में पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी। इंदिरा गांधी तुरंत युद्ध चाहती थी,लेकिन मानेक शॉ ने उन्हें कहा कि हमें हिमालय पर बर्फ पिघलने तक शांत रहना चाहिए, क्योंकि चीन औऱ पाकिस्तान दो मोर्चे पर भारतीय सेना नहीं लड़ सकती है औऱ भारत के पास पूर्वी मोर्चे पर टैंक काफी कम है। 

सैम मानेक शॉ ने मार्च के महीने में युदध से इनकार किया था



इंदिरा गांधी चाहती थीं कि मार्च के महीने में युद्ध लड़ा जाए, लेकिन सैम जानते थे कि युद्ध के लिए भारतीय सेना तैयार नहीं है। तैयारी के लिए उन्हें समय चाहिए था। उन्होंने इंदिया गांधी को स्पष्ट शब्दों में युद्ध के लिए मना कर दिया था। उन्होंने इतना तक कहा- मैं अपने स्वास्थ्य के आधार पर इस्तीफा दे सकता हूं। इसके बाद, इंदिरा गांधी ने सैम के इस्तीफे से इनकार कर दिया सैम ने कहा अगर उन्हें अपनी शर्तों पर युद्ध की तैयारी की अनुमति दी जाएगी, तो वो जीत की गारंटी देते हैं। इंदिरा गांधी ने सैम की सभी शर्तों को स्वीकार किया और फिर इसके बाद जो हुआ वह पूरी दुनिया को पता है।

सैम ने एक इंटरव्यू में बताया कि इंदिरा गांधी ने कहा था, 'युद्ध लड़ने के लिए चले जाओ', लेकिन मैं तैयार नहीं हुआ, मैं जानता था, फोकस करना पड़ेगा, योजना बनानी पड़ेगी, सेना को तैयार करना पड़ेगा, जिसके लिए पर्याप्त समय की जरूरत थी।

उस समय सैम मानेक शॉ ही थे, जो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बात को इनकार करने की हिम्मत रखते थे। वह जानते थे कि अधूरी तैयारी के साथ युद्ध के मैदान में जाना हार का मुंह देखने की तरह है। जंग में हार की शर्मिंदगी से बचने के लिए उन्होंने इंदिरा गांधी गा गुस्सा झेलना उचित समझा।  इंदिरा गांधी को मना करने के सात महीने बाद मानेक शॉ ने युद्ध के लिए हामी भरी थी, तब दिसंबर का महीना था और हिमालय पर बर्फ पड़ने लगी थी। चीन के हस्तक्षेप का डर नहीं था और भारत की सेना पाकिस्तान पर फोकस कर सकती थी और यही हुआ भी।



पाकिस्तान की सेना द्वारा अत्याचार के कारण भारत की पूर्वी सीमा पर लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी के रूप में आ रहे थे। स्थिति पहले से ही तनावपूर्ण थी। इसके अलावा 1971 में पाकिस्तान द्वारा उत्तर भारत के ऊपर हवाई हमले शुरू करने के बाद भारत बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शामिल हुआ। बाद में भारत-पाकिस्तान युद्ध दो युद्ध मोर्चों पर लड़ा गया था। मानेक शॉ के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध का शंखनाद कर दिया।



9 दिसंबर 1971 को मानेक शॉ का पाकिस्तानी सैनिकों को पहला रेडियो संदेश था-भारतीय सेनाओं ने आपको घेर लिया है। आपकी वायु सेना नष्ट हो गई है। आपको उनसे किसी तरह की मदद की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। चटगाँव, चल्ना और मंगला बंदरगाह सील हो गए हैं। कोई भी आपको समुद्र से मदद नहीं पहुंचा सकता है। आपकी किस्मत अब हमारे हाथों में है। मुक्ति वाहिनी और बाकी लोग आपके द्वारा किए गए अत्याचारों और क्रूरताओं का बदला लेने के लिए तैयार हैं बर्बादी से किसी को क्या मिलेगा ? क्या आप घर नहीं जाना चाहते और अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं? समय मत गंवाओ; एक सैनिक के लिए शस्त्र डालने में कोई अपमान नहीं है। हम आपको एक सिपाही की इज़्ज़त मान-सम्मान देंगे।



महज 13 दिनों में, पाकिस्तान ने 16 दिसंबर, 1971 को ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया। 93 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने जनरल नियाजी के नेतृत्व में जनरल जे एस आरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया। दुनिया के नक्शे पर एक नए राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश का जन्म हुआ। बांग्लादेश के जन्म के साथ ही मोहम्मद अली जिन्ना का द्विराष्ट्र का सिद्धांत पूरी तरह से जमींदोज हो गया।

अंततः निमोनिया की जटिलताओं के कारण सैम की मृत्यु हो गई और उनके अंतिम शब्द यही थे- मैं ठीक हूँ मानेकशॉ के अंतिम संस्कार में वीआईपी प्रतिनिधित्व का अभाव था।

सैम मानेक शॉ की बहादुरी, साहस, अनुशासन और दृढ़ संकल्प के लिए हम सभी देशवासी उनको सलाम करते हैं। जब-जब बांग्लादश की मुक्ति का जिक्र होगा सैम मानेक शॉ का नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा। जय हिंद, वंदे मातरम्।


#VijayDiwas2021 #1971WarVictory #1971war #BangladeshLiberationWar #BangladeshMuktiSangram

#Bangledsh #VijayDiwas #sammanekshaw #IndiraGandhi #Pakistan #NarendraModi #AmitShah #BJP #RSS #IndianArmy #BIPINRAWAT #CDSBIPINRAWAT

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें