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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के बीच उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव केंद्र और भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा है

हरेश कुमार 



गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस के बढ़ते दामों पर केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर थे। वहीं, हाल के दिनों में पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी देखी गई है,लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आ रही है। न केंद्र सरकार की ओर से और न ही विपक्ष की ओर से।

पेट्रोल-डीजल, सीएनजी, घरेलू गैस की बढ़ती कीमतों से आम इंसान का जनजीवन बहुत ज्यादा प्रभावित हो चुका है। इसके बावजूद इसे कम करने को लेकर कोई भी राहत मिलती नहीं दिखाई दे रही है।
यह सही है कि केंद्र सरकार कई मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है। इससे पहले किसी सरकार ने सीमा पर विकास को इतनी तरजीह न दी थी, जो मौजूदा सरकार में मिल रही है। चीन से तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने सीमा पर सड़कों और मूलभूत संरचनाओं का जाल बिछाने में दिन-रात एक कर दिया है। इसके पहले केंद्र में रही कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों की सरकारों ने सीमा पर कोई भी विकास कार्य न किया था। उन सरकारों का मानना था कि सीमा पर विकास कार्य न करना ही सही है। वहीं, दूसरी तरफ चीन लगातार अपने कब्जाए तिब्बत के सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास गतिविधियों को बढ़ावा देने में लगा रहा।
गौरतलब है कि भारत की कोई सीमा चीन से कभी नहीं मिलती रही है। चीन द्वारा तिब्बत पर बलपूर्वक कब्जा करने और भारत की चुप्पी ने चीन को बढ़त दिला दी थी। भारत अगर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के इस कब्जे का जोरदार विरोध करता या तिब्बत के पक्ष में खड़ा होता तो चीन की इतनी हिम्मत न बढ़ती,लेकिन तत्कालीन नेहरू के नेतृत्व वाली की सरकार ने भारत की सरकार ने चीन के आगे पूरी तरह से घुटने टेक दिए थे। जब पानी सिर के ऊपर बहने लगा तो भारत की सेना रक्षा के लिए आगे आई,लेकिन तब भी वायुसेना को नेहरू ने इजाजत न दी। हमारी सेना के पास ठंड में पहनने के लिए कपड़े तक न थे। इस कारण से पूरी की पूरी बटालियन बिना लड़े शहीद हो गई। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत के जांबाज सैनिकों ने चीन को मुंहतोड़ जवाब दिया। मेजर शैतान सिंह से लेकर जसवंत सिंह रावत जैसे सैनिकों ने चीन को दांतों चने चबा दिए थे।
भारत सरकार ने सैनिक तैयारियों में कमी न की होती तो चीन हमारी जमीन कब्जा न कर पाता। देश के पहले घोटाला, जीप घोटाला के मास्टर माइंड रहे वी के कृष्ण मेनन को नेहरू ने रक्षा मंत्री न बनाया होता तो युद्ध का परिणाम निश्चित तौर पर अलग होता।
हम बात कर रहे थे हाल के दिनों में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी पर केंद्र और विपक्ष की चुप्पी को लेकर। यह सही है कि केंद्र सरकार चीन की चालाकी को देखते हुए सीमा पर सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने में लगी है और इसमें काफी पैसे की जरूरत है। इसके अलावा 2019 में चीन के औद्योगिक शहर वुहान की प्रयोगशाला में पैदा किए गए कोरोना वायरस ने भारत सहित दुनिया के अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन चीन के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है। चीन को दंडित करने की जगह वह उसके इशारों पर नाच रहा है। ऐसी स्थिति में विश्व स्वास्थ्य संगठन से कोई उम्मीद नहीं है।
आने वाले समय में भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाला है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा ही फिर से केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के भविष्य को तय करेगा।
कांग्रेस और वामपंथी ताकतें इस फिराक में लगी हैं कि किसी तरह से देश में अव्यवस्था का माहौल बनाया जाए और इसके लिए वो सोशल मीडिया से लेकर हर जगह फर्जी मुद्दे बनाकर अपने समर्थकों के द्वारा समाज में वैमनस्यता फैलाने में लगी हुई है।
हम सभी को सचेत रहना होगा।
कश्मीर से लेकर केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल. राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ में जिस तरह की गतिविधियां हो रही हैं। यह किसी से छुपी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान, चीन भारत विरोध का पहले से केंद्र रहे हैं। इनमें अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से यह भी चीन-पाकिस्तान के साथ शामिल हो चुका है। ऐसे माहौल में भारत सरकार को अफगानिस्तान में सत्तारूढ़ तालिबान के साथ सधे कदमों से चलना होगा, ताकि वहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों और भारत सरकार द्वारा विकसित किए गए प्रोजेक्ट पर आंच न आने पाये। तालिबान को इग्नोर कर भारत सरकार पाकिस्तान के ही हाथ को मजबूत करेगी। वास्तविकता से हम मुंह नहीं मोड़ सकते कि आज की तारीख में तालिबान अफगानिस्तान पर काबिज है और आने वाले समय में वहां गृहयुद्ध की स्थिति भड़क सकती है, क्योंकि तालिबान के आने के बाद अफगानिस्तान की आर्थिक स्थिति बुरी तरह से लड़खड़ा चुकी है।
अंत में:
भारत सरकार को आम आदमी के हितों को ध्यान में रखने के साथ-साथ कदम बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि इस देश में मुफ्त बिजली और पानी देकर भी पार्टियां सत्ता में काबिज हो जाती है, भले ही वो आगे चलकर ट्रांसपोर्ट व्यवस्था तक को न संभाल पाए। हम सभी ने देखा कि किस तरह से तथाकथित विश्व प्रसिद्ध मॉडल मोहल्ला क्लिनिक में कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान प्रभावित लोगों को बुखार तक चेक न हो सका यह पूरी तरह से सफेद हाथी साबित हुआ। केंद्र सरकार को दो-दो बार हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि राज्य सरकार लगभग हर मोर्चे पर विफल हो चुकी थी। इसके बावजूद यहां देखने वाली बात यह भी है कि राज्य सरकार को समर्थन करने वालों (मोदी के अंध विरोधियों) में कोई कमी नहीं आई है।
इसलिए केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी को आने वाले चुनाव में फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इन चुनावों में देश की सुरक्षा से लेकर आम आदमी से जुड़े हर मुद्दों पर फोकस करना होगा।

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