हरेश कुमार
एक सांसद वाराणसी से है, जहां अरबों की परियोजनाएं चल रही हैं तो दूसरा सांसद हमारे शिवहर जिले से हैं, जहां परियोजनाएं महज इसलिए चलाई जा रही हैं, ताकि कमीशनखोरी होता रहे।मजाल है कि एक भी परियोजना समय से पूरा हुआ हो।
बिहार के सबसे छोटे और पिछड़े जिले शिवहर का दुर्भाग्य है कि यहां एनएच 104 का निर्माण दशक भर से ज्यादा समय से जारी है,लेकिन आजतक काम पूरा नहीं हुआ। इस कारण से गर्मी में जहां धूल उड़ता है तो बारिश और बाढ़ में कीचड़ सना होता है। दुर्भाग्य से मरीज अगर इस रास्ते से जाए तो उसका मरना निश्चित है।
बेलवा डैम ऐसी दुधारू परियोजना है, जहां कितने ठेकेदार बदल गए और हर साल इसके पूरा होने की बात कही जाती है,लेकिन कहावत है न- नौ दिन चले अढ़ाई कोस, सो हर साल एक नया ठेकेदार आता है और काम शुरू होते-होते बाढ़ का समय आ जाता है।
हालात ऐसे हैं कि देवापुर (मोतिहारी/पूर्वी चंपारण) और बेलवा (शिवहर) के 3 किलोमीटर के बीच चार दशक में जमीन सर्वे का काम पूरा तक नहीं हो सका है,लेकिन मजाल है कि किसी नेता या अधिकारी को शर्म आए। आएगी कैसे, सारे शर्महीन जो ठहरे, बेहया के घाट पर नहाए हुए हैं सब।
निर्लज्जता की पराकाष्ठा को पार कर चुके हैं। इन सबको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।
6 अक्टूबर 1994 को जिला बनने के बाद से यह देश का पहला ऐसा अभागा जिला है, जो रेल सेवाओं से महरूम है,लेकिन किसी नेता को इससे क्या फर्क पड़ता है उसके पास तो फॉर्च्यूनर है न। सड़क चाहे कैसी भी हो इन गाड़ियों के लिए प्रशासन हमेशा रास्ता साफ करते चलता है।
छोटे-से जिला में नाली के निर्माण के लिए 48 करोड का बजट सब मिल-बांटकर खा गए। नाली का ऐसा निर्माण किया कि सड़क से लेकर घर और दुकान सब बरसात के पानी की भेंट चढ़ गया। डर के मारे कोई बोलता नहीं है।
सदर अस्पताल को जाने वाली सड़क वेंटिलेटर पर आखिरी सांस ले रही है, यहां सिर्फ एसयूवी गाड़ियां ही सही से गुजर सकती हैं, बाद बाकी पैदल चलने वालों को भी उनकी नानी के किस्से याद आ जाते होंगे।
यह जिला असुविधाओं के मामले में दुनिया के सबसे पिछड़े अफ्रीकी देशों को भी मात दे सकता है, बशर्ते कि सही से आकलन किया जाए। यहां ढंग का एक डिग्री कॉलेज तक नहीं है, जहां विज्ञान की पढ़ाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद यहां के छात्र-छात्रा देशभर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में कामयाब रहे हैं।
बाढ़-बरसात के समय शिवहर का संपर्क आसपास के जिलों से चार महीनों तक कटा रहता है। मजाल है कि किसी नेता को कोई दिक्कत आए। वोट के समय ब जाति के नामव पर सवार होते हैं और हर बाधा को पार कर जाते हैं। बागमती की बाढ़ से प्रभावित इस जिला में पुल-पुलियों की भारी कमी है,जो बन भी रहे हैं, उनमें इतना ज्यादा भ्रष्टाचार है कि उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं है।
शिवहर में आपको हर समय शराब मिल जाएगा, बशर्ते कि आपके पॉकिट में पैसा हो। कानून-व्यवस्था की स्थिति यह है कि नक्सली तेजी से पांव पसार रहे हैं औऱ छोटे-से जिला में एके-47 कब बरस जाए, कहा नहीं जा सकता।
शिवहर का दुर्भाग्य है कि यहां कोई ऐसा नेता नहीं, जो इसके लोगों को दु:ख-दर्द समझ सके।




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें