हरेश कुमार
सुशांत सिंह के हत्यारे को अभी तक सीबीआई पकड़ नहीं पाई है या जानबूझकर पकड़ना नहीं चाहती है, क्योंकि इसकी बागडोर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के हाथ में है और वह अब भी महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना से गठजोड़ की संभावनाओं को खारिज नहीं करना चाहती। यह एक नंगी सच्चाई है। मजबूरीवश लोग भारतीय जनता पार्टी को वोट दे रहे हैं. अन्यथा जिस तरह से पालघर में दो निर्दोष संतों और उनके ड्राइवर की महाराष्ट्र पुलिस के हथियारबंद जवानों के सामने कन्वर्टेड ईसाइयों द्वारा हत्या की गई और महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने अपराधियों का खुलकर बचाव किया। इस एक अपराध के लिए सरकार को बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन देश का दुर्भाग्य यह है कि दक्षिणपंथ के लोग इसे मुद्दा तक नहीं बना सकें।
वामपंथी अपराधी तबरेज़ की हत्या को मुद्दा बना लेता है और उसपर टीबी डिबेट शुरू हो जाती है, लेकिन छद्म सेक्युलरिज्म और तुष्टिकरण की नीतियों के कारण पालघर में दिनदहाड़े योजनाबद्ध तरीके से महाराष्ट्र पुलिस के हथियार बंद जवानों के सामने कन्वर्टेड ईसाइयों द्वारा दो निहत्थे और निर्दोष हिंदू संत और उनके ड्राइवर की हत्या करने के बावजूद केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरी रह जाती है।
सच पूछा जाए तो इस तरह के एक नहीं कई मामले आए और सरकार ने कार्रवाई करने की जगह जानबूझकर लापरवाही दिखाई, जिसके कारण उत्तर- पूर्वी दिल्ली में सुनियोजित दंगे हुए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दंगे में पचास से अधिक लोग मारे गए और अरबों की संपत्ति जलाकर खाक कर दिया गया।नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ विपक्षी दलों खासकर कठमुल्लों द्वारा जामिया मिलिया इस्लामिया के आसपास आयोजित धरना और वहां लगाए जा रहे नारों, भाग लेने और उसे शह देने वाले नेताओं, तथाकथित बुद्धिजीवियों, पत्रकार कम पक्षकारों पर कड़ी कार्रवाई करती, तो दिल्ली में कभी दंगे नहीं होते. यह सरकार कान में तेल डालकर सोती रही और दिल्ली धू-धू कर जलती रही।
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान इस तरह की साजिश को अंजाम देना साफ-साफ खुफिया एजेंसियों और संबंधित मंत्री की नाकामयाबी थी। दूसरे देश में संबंधित मंत्री को कब का चलता कर दिया गया होता, लेकिन यहाँ एक के लिए अलग पैमाना होता है तो दूसरे के लिए अलग।
कोविड की दूसरी लहर को सही से टेकल नहीं करने के कारण गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को चलता कर दिया गया, यही पैमाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लागू किया जाना चाहिए था। दूसरी लहर को संभालने में मोदी पूरी तरह से नाकाम रहे थे, लेकिन मोदी ओर शाह के लिए पैमाना अलग है।
पालघर में संतों की हत्या के बाद सुशांत सिंह राजपूत की एक्स मैनेजर दिशा बालियान का रेप कर हत्या कर दी गई।मीडिया में छनकर आई खबरों के अनुसार, हत्यारा महाराष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करने वाले लोगों में से है। हत्यारे की हिम्मत तो देखिए उसने कुछ समय बाद ही सुशांत सिंह राजपूत की भी हत्या कर दी। इस हत्या को सुसाइड साबित करने के लिए हत्यारे ने अपनी राजनीतिक पहुँच का भरपूर इस्तेमाल किया। देर रात को पोस्टमार्टम किया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार देर रात को पोस्टमॉर्टम नहीं करना है। बिसरा रिपोर्ट के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई, ताकि भविष्य में संदेह का लाभ अपराधी को मिल जाए।
सुशांत सिंह राजपूत के पास न तो फिल्मों की कोई कमी थी और न कोई फाइनेंशियल समस्या। घर से भी वो मजबूत थे। वे एक पढ़े-लिखे समझदार इंसान थे, जो अपने गांव-समाज के लिए कुछ करना चाहते थे। वे ऑर्गेनिक खेती से लेकर बच्चों को लेकर चांद की यात्रा करना चाहते थे। उन्होंने अगले पचास सालों के खाका तैयार किया था।
सुशांत सिंह राजपूत छह फुट के स्वस्थ जवान थे और उन्हें मारने से पहले बुरी तरह से पीटा गया था, जैसा कि टीवी पर शव को देखने से लग रहा था। उन्होंने अपराधियों से पूरी ताकत लगाकर मुकाबला किया था। हत्यारों ने उनकी पैर तोड़ दी थी। वह उतने छोटे कमरे में सुसाइड कर ही नहीं सकते थे। पंखा उनका वजन कैसे सह गया। स्टूल लगाकर अगर उन्होंने सुसाइड किया तो कमरे कई हाइट कितनी थी।
मीडिया में आई खबरों के अनुसार, दो दिन के अंदर ही कमरे का रंगोरोगन कर दिया गया था। आखिर, इतनी जल्दी किस बात की थी। हत्या के बाद पूरी सफाई से हत्यारे ने प्रशासन के सहयोग से एक-एक करके सबूतों को मिटा दिया। यह सब प्रशासन और उच्च स्तरीय राजनीतिक संपर्कों के बिना कभी भी संभव नहीं है।
देश का आम आदमी भी इस सच्चाई को जान चुका है। आखिर, क्या कारण था कि बिहार की पुलिस को हत्या की जांच से बार-बार रोकने का प्रयास किया गया। पटना पुलिस के तेजतर्रार अधिकारियों को जानबूझकर कोरोना संक्रमण के नियमों का हवाला देते हुए क्वारंटाइन किया गया। वहीं, तुर्की से फिल्म की शूटिंग कर आये आमिर खान को बिना क्वारंटाइन के घर जाने दिया गया।एक ही नियम दो लोगों पर अलग कैसे. पटना सिटी के तत्कालीन एसपी विनय तिवारी के लिए अलग और अभिनेता के लिए अलग।
देश के लोग राजनीति और नेताओं के इस घृणित चेहरे को बहुत नजदीकी से देख रहे हैं। एक तरफ, कंगना रनोट के बंगले को अतिक्रमण के नाम पर ढहाने की कार्रवाई और दूसरों को खुला समर्थन।
यह सब साफ जाहिर करता है कि सुशांत सिंह राजपूत की हत्या की गई थी। एक साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद केंद्रीय जांच एजेंसी अब तक किसी हत्यारे को न गिरफ्तार कर पाई है और न देश को कोई भरोसेमंद सबूत दे पाई है कि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हत्यारों के गिरेबान में वह हाथ डालने को तैयार है।
सच मानिये तो यह अब तक की सबसे कमजोर सरकार रही है, जो कई मामलों में जानबूझकर लीपापोती करने में शामिल रही है। यही वजह है कि सुशांत सिंह राजपूत के हत्यारे खुली हवा में सांस ले रहे हैं और उनपर अभी तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

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