हरेश कुमार
भारत में हर नेता अपने पुत्र/पुत्री या निकट संबंधियों को अपनी राजगद्दी सौंप देता है। चाहे किसी भी पार्टी की बात करें, यह रोग सभी पार्टियों में धर चुका है। राजनीति को सभी ने धंधा बना लिया है। हींग लगे न फिटकिरी रंग होए चोखा, वाली कहावत पूरी तरह फिट बैठती है। ऊपर से नेतागीरी के धंधा में उतरने के लिए किसी योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। अनपढ़, गंवार, हत्यारा, बलात्कारी सब राजनीति में योग्य माने जाते हैं। एकबार राजनीति में एंट्री हो गई तो बिना कुछ किए धरे ही सात पुश्तों की गरीबी मिट जाती है। गरीबों का हक मारनेवाला आजीवन गरीबों का हितैषी बना रहता है। ये बड़ी-बड़ी सभाओं में गरीबी मिटाने की बात करते हैं।
इन सबको शर्म नहीं आती, पूरी तरह बेहया हो चुके हैं। छोटा-सा देश सिंगापुर भारत से कई गुणा समृद्धशाली देश बन चुका है,क्योंकि वहां आपराधिक और भ्रष्ट प्रवृत्ति के लोगों को तुरंत सजा मिलती है। राजनीति में योग्य लोग जाते हैं। यह देश का दुर्भाग्य है कि चपरासी के लिए योग्यता का निर्धारण किया गया है और नेताओं के लिए कोई योग्यता नहीं। हत्या और बलात्कार जैसे जघन्यतम अपराधों में शामिल लोग स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत से सबूतों को या तो नष्ट कर देते हैं या छेड़छाड़ कर देते हैं, जिसका फायदा उठाकर पाकसाफ बच निकलते हैं और आगे चलकर पूरी बेहयाई से देश की संसद और विधानसभा में शोभा बढ़ाते हैं।
इजरायल हिंदी में आज 57मुस्लिम देशों के सामने सीना तानकर खड़ा है तो उसका एकमात्र कारण वहां सभी के लिए सैनिक प्रशिक्षण अनिवार्य होना है। वहां हर वयस्क दो साल सेना में अनिवार्य रूप से ड्यूटी देता है, चाहे वो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का ही बेटा या बेटी क्यों न हो?इसके ठीक विपरीत भारत का उदाहरण लें तो यहां के नेतागण अपने बच्चों को सेना में नहीं भेजते। यहां तक कि व्यापारी समुदाय से गिनेचुने लोग ही सेना में जाते हैं। गुजरात को उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं। यहां से गिनेचुने न के बराबर युवक-युवती सेना में जाते हैं। पहले तो एक भी नहीं जाते थे। अब एकाध लोग जाने लगे हैं। हालांकि, अब भी यह अपवाद के तौर पर ही है। यहां हर कोई अंबानी, अडानी बनना चाहता है,लेकिन जब देश के लिए जान देने की बात आती है तो फिर देश का सबसे पिछड़े राज्य में शुमार बिहार का बिहार रेजिमेंट और अन्य ही काम आता है। उत्तराखंड के लोगों में सेना में भर्ती होने का एक अलग भी जुनून है। जहां तक मेरी जानकारी है -उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की पुत्री भी सेना में है। कभी पंजाब के युवाओं का सेना में वर्चस्व हुआ करता था,जो पाकिस्तान के जाल में फंसकर नशे की गिरफ्त में आ चुका है। पंजाब में पाकिस्तान की कृपा से घर-घर में नशे के आदी बन चुके हैं। छद्मसेक्युलरिज्म की कांग्रेस की नीतियों ने भी पंजाब के युवाओं का बहुत नुकसान किया है। जिस सिख धर्म की स्थापना मुगलों के अत्याचार के विरोध में हुई थी आज उनके लोग शाहीन बाग में लंगर लगा रहे हैं। तथाकथित किसानों के साथ खड़े हैं, जिनका किसानों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। इन्हीं सब कारणों से अफगानिस्तान में सिख पूरी तरह से खत्म हो गए, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ रहा। सबको छद्मसेक्युलरिज्म की बीमारी लग गई है। एकबारगी अपने गुरुओं की कुर्बार्नियों को ही याद कर लेते।
पंजाब के युवाओं की जगह अब हरियाणा के युवा खेल और सेना में जा रहे हैं। हालांकि, दिल्ली-एनसीआर से निकटता के कारण यहां के लोगों में अपराध की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। यह बड़ी चिंता का विषय बन चुका है।

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