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बुधवार, 3 मार्च 2021

एजेंडाधारियों के चेहरे से नकाब उतारता सोशल मीडिया


 हरेश कुमार

कभी हम मार्कण्डेय काटजू को पढ़ा करते थे, तब इतनी समझ नहीं थी कि मीडिया से लेकर न्यायपालिका में कार्यरत लोगों का भी अपना एक एजेंडा होता है और वो इसके लिए किसी भी हद तक चले जाने को तैयार होते हैं। पत्रकारिता में आए फिर लॉ को पढ़ा और दुनिया को जाना-समझा तो मालूम हुआ कि जिसे अब तक हम ईश्वर का अवतार मानते आ रहे थे, वो सभी बिके हुए लोग हैं। धीरे-धीरे करके हमारा भरोसा इन सबसे उठता चला गया। इनमें वकालत के पेशे से कई सारे नाम हैं तो पत्रकारिता के पेशे से भी बहुत सारे हैं, जिन्हें कभी हम आदर्श माना करते थे। ये सभी कांग्रेसी और वामपंथी एजेंट निकले,जो पार्टी की लाइन के अनुसार काम किया करते थे।
कश्मीर से लाखों हिंदुओं को भगाया गया तब किसी काटजू ने न्यायपालिका और सरकार को मजबूर नहीं किया कि कश्मीरी पंडितों के हितों की रक्षा हो सके।
नीरव मोदी के भारत प्रत्यार्पण केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस काटजू ने जिस तरह से बेसिर-पैर की बातें की, वह किसी भी भारतवासी के लिए सही नहीं। नीरव मोदी भगोड़ा अपराधी है। केंद्र सरकार उसे भारत लाकर सजा देने का प्रयास कर रही थी और ये उसे बचाने में लगे थे।
जस्टिस काटजू ने एक सेमिनार में कहा था कि '90 प्रतिशत भारतीय बेवकूफ' होते हैं जो धर्म के नाम पर आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इनक सभी बातें गलत हैं। कई बार ये सही भी होते हैं।
कभी मैं प्रशांत भूषण और उनके पिताजी शांति भूषण कोआदर्श माना करता था, लेकिन संसद पर हमले के आरोपी याकूब मेमन को फांसी से बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद ये नशा भी उतर गया। इसमें कोई शक नहीं कि प्रशांत भूषण ने अतीत में कई अच्छे काम किए हैं,लेकिन 2014 के बाद से इनका एक और चेहरा दिखा, जो अत्यंत निंदनीय है और वो हैं आंख मूंदकर केंद्र सरकार के हर फैसले का विरोध करना। जो गलत है उसका विरोध करें,लेकिन हर फैसले का विरोध करना, यह किसी भी तरह से सही नहीं।
मीडिया में भी कई ऐसे चेहरे थे, जिसे थोड़ा-बहुत पढ़ा और सुना करते थे। वैसे तो लिखूं तो पन्ने कम पड़ जाएंगे। ऐसे लोग जो कभी कांग्रेस और वामपंथी व समाजवादी नामधारी दलों और उसके नेताओं के पक्ष में खबरें प्लॉटिंग करते थे, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद ये अर्द्ध-विक्षिप्ता अवस्था में हैं। ये सरकार को कोसने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। नमक का कर्ज चुका रहे हैं।
इन सबने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ मुसलमानों को भड़काने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। दिल्ली में दंगा कराने में इन सबकी भूमिका की जांच हो तो कई चेहरों से नकाब उतर जाएंगे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन?
नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत तूफानी अंदाज से की थी। तीन तलाक पर कानून, कश्मीर से आर्टिकल 370 और अनुच्छेद 35 ए खत्म करना, जिसके बारे में नेताओं ने यह धारणा बना दी थी कि इसे छूने से देश भर में आग लग जाएगी, दंगे भड़क जाएंगे,लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर को दो भाग में बांटते हुए इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया और सारा तमाशा खत्म हो गया।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की सभी बाधाओं को सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दिया। तब ऐसे ही लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को बिकने से लेकर न जाने क्या-क्या टिप्पणी की थी। ये वही लोग थे जो इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के समय मुंह बंद करके रखे थे। इंदिरा गांधी ने 3-3 वरिष्ठ जजों की अनदेखी कर जूनियर को सुप्रीम कोर्ट क मुख्य न्यायधीश बनाया था, तब किसी ने एक कलम तक नहीं चलाई थी। आका जो करें, सब सही है। ऐसे लोगों को बहुत तकलीफ होने लगी कि केंद्र सरकार ने राम मंदिर निर्माण की सभी बाधाओं को बिना किसी हो-हल्ला के कैसे खत्म कर दिया। इन लोगों की दुकानदारी पर गहरी चोट होने लगी थी, तभी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ मुसलमानों को भड़काने की मुहिम चालू की गई, जिसमें जेएनयू, जामिया और अन्य विश्वविद्यालयों से वामपंथी बुद्धिजीवियों ने आग में घी का काम किया।
नागरिकता संशोधन कानून पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुस्लिमों द्वारा प्रताड़ित हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए लाया गया था, जिसका देश के मुस्लिमों से कोई लेना-देना नहीं था।
इन सभी ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो दिवसीय भारत दौरे के दौरान दिल्ली में दंगे की साजिश रची, ताकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धक्का लगे और ये सब ऐसा करने में कामयाब रहे। भारत सरकार की खुफिया एजेंसी की यह बहुत बड़ी नाकामयाबी थी,जो शाहीन बाग धरना के प्रायोजक आतंकी संगठन सिमी के नए रूप पीपुल्स फोरम ऑफ इंडिया (पीएफआई) और इसके एजेंडे को वो समझ नहीं पाई। जब दिल्ली जलने लगा तब जाकर इन सबकी पोल खुली।

इन घटनाओं से एक बात साफ तौर पर स्पष्ट हो गई कि मुस्लिम और ईसाई तुष्टिकरण की कांग्रेसी-वामपंथी और तथाकथित समाजवादी नामधारी पार्टियों की नीतियों ने देश को ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा कर रखा है। कोरोना के समय तबलीगी जमात और इसके समर्थकों का अत्यंत घृणित चेहरा बाहर आया, जिसे देश और दुनिया भर के लोगों ने देखा। ये सब इतने धर्मांध हैं कि इन्हें अपने सिवाय कुछ दिखता नहीं है।

सोशल मीडिया के कारण इन सभी के चेहरे और एजेंडे से नकाब उतरने लगा है। हालांकि, लोग सबकुछ जानने-समझने के बावजूद छद्मसेक्युलरिज्म से बाहर नहीं आ रहे। समय-समय पर इसका परिणाम देश को भुगतना पड़ रहा है।

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