हरेश कुमार
कांग्रेस, वामपंथी, तथाकथित समाजवादी नामधारी पार्टियों द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण और ईसाई मिशनरियों को खुली छूट देने से अंदर ही अंदर घुट रहे सनातन धर्मावलंबियों ने एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी को केंद्र और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सत्तारूढ़ कर दिया। पार्टी और सत्ता पर पकड़ के बाद मोदी और शाह ने भाजपा के पितृपुरुष लालकृष्ण आडवाणी को वो सम्मान नहीं दिया, जिसके वो हकदार थे।
हालांकि, सत्तारूढ़ होने की जल्दबाजी में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने दूसरे दलों के तमाम भ्रष्टाचारियों और आपराधिक मामलों में फंसे नेताओं को दल में जगह दे दी। इससे भाजपा का प्रभाव कुछ समय के लिए भले बढ़ गया हो, लेकिन उसके बारे में आम जनमानस में जो धारणा थी,वो सदा-सदा के लिए खत्म हो गई। चाल, चरित्र और चेहरा को खंडित होते लोगों ने देखा। जिस पार्टी को लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे महारथियों ने शून्य से शुरुआत कर 182सांसदों तक पहुंचाया था आज उसी पार्टी में उनकी दशा को देखकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मैनेजमेंट पर मन दुखी हो जाता है।
आडवाणी और उनकी टीम ने जनसंघ से लेकर भाजपा को एक मजबूत नींव प्रदान किया, जिस पर आज विशाल भवन खड़ा हे। मकान बनाने के क्रम में सबसे पहला सबक नींव की मजबूती पर ध्यान देना होता है। मकान का नींव मजबूत होगा तो उसपर आप जितना विशाल घर बनाना चाहें, बना सकते हैं। आडवाणी भाजपा के पितृपुरुष हैं। उन्होंने पूरे भारत में रथ यात्रा निकाल कर भाजपा को घर-घर पहुंचाने में शानदार भूमिका निभाई। यह भी उतना ही सही है कि आडवाणी ने अपने सलाहकारों के कहने पर पाकिस्तान की यात्रा की और करोड़ों हिंदुओं के हत्यारे मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बता कर उसकी मजार पर चादर चढ़ाई थी,जो किसी भी सनातन धर्मावलंबी हिंदू को पसंद नहीं आया और अंत में आडवाणी को बनवास भुगतना पड़ा।
आडवाणी को कम से कम राष्ट्रपति पद पर होना चाहिए था।नरेंद्र मोदी और अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब भी अपनी गलतियों को सुधार सकते हैं। यह भाजपा के पितृपुरुष आडवाणी के लिए पार्टी के लिए उनके किए गए योगदान का एक छोटा-सा उपहार होगा। आडवाणी चाहते तो अटल बिहारी वाजपेयी की जगह खुद प्रधानमंत्री बन सकते थे। जब चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और गुजराल प्रधानमंत्री बन गए उनके मुकाबले आडवाणी का कद और स्वीकार्यता बहुत व्यापक था। हालांकि, आडवाणी ने विनम्रतापूर्वक वाजपेयी के लिए यह पद छोड़ दिया और वाजपेयी के साथ हमेशा नंबर दो बने रहे। याद करें उस समय को जब नरेंद्र मोदी उनके सारथी हुआ करते थे। यह आडवाणी ही थे, जो गोधरा के समय नरेंद्र मोदी के साथ खड़े थे, जब वाजपेयी उन्हें राजधर्म का पाठ पढ़ा रहे थे।
राजनीति इतनी निरंकुश होती है कि आडवाणी देशभर में भाजपा का प्रचार कर रहे थे और उनके विरोधी उन्हें नईदिल्ली सीट से निपटाने में व्यस्त थे। कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने मदद न की होती तो आडवाणी नई दिल्ली सीट से हार चुके थे। कांग्रेस के ही तत्कालीन दिग्गजों ने राजेश खन्ना के विजयी रथ को रोका और यह सब इसलिए संभव हो सका था,क्योंकि ईवीएम नहीं था। अंततः ढ़ाई हजार वोटों से आडवाणी की जीत की घोषणा करवाई गई। कांग्रेस के नेता नहीं चाहते थे कि राजेश खन्ना का कद हमसे आगे हो। बाद में आडवाणी इन सबसे इतने क्षुब्ध हुए की उन्होंने दिल्ली को सदा के लिए बाय कहकर गुजरात के अहमदाबाद का रुख कर लिया। जिन लोगों को आडवाणी ने आगे बढ़ाया,वही लोग आगे चलकर उनकी राह का रोड़ा बने। आडवाणी भले कुछ न कहें,लेकिन उनकी बेचैनी और बॉडी लैंग्वेज सबकुछ कह देती है।



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