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सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

कांग्रेस, वामपंथी और समाजवादी नामधारी पार्टियों व बुद्धिजीवियों के एजेंडे से देश को बचाना बेहद जरूरी है

हरेश कुमार



किसानों को कृषि कानून के खिलाफ भड़काने वाले तथाकथित परगतिशील शुतुरमुर्गी बुद्धिजीवी बहुत ही काइयाँ हैं। ये एक बात को उभारते हैं और दूसरे बात को दबा देते हैं। ये अपने आप को न्याय का पक्षधर भी बताते हैं। छद्मसेक्युलरिज्म और तुष्टिकरण की बीमारी से ग्रसित ऐसे बुद्धिजीवियों के दिमाग और आंख के एक खास हिस्से को लकवा (पैरालिसिस) मार चुका होता है। यह सिर्फ अपनी बात कहते और सुनते हैं, जैसे इन्हें आईना दिखाने की कोशिश करेंगे, ये आपको ब्लॉक कर देंगे। पहले तो ये चिकनी-चुपड़ी बातों से आपको बहलाने की कोशिश करेंगे,लेकिन जब लगेगा कि बंदा एक्सपोज कर देगा तो ये आप पर आरोप लगाते हुए निकल भागेंगे। कांग्रेस, वामपंथी और समाजवादी नामधारी पार्टियों व बुद्धिजीवियों के एजेंडे से देश को बचाना बेहद जरूरी है। 



छद्मसेक्युलरिज्म और तुष्टिकरण की लाइलाज बीमारी से पीड़ित तथाकथित परगतिशील शुतुरमुर्गी बुद्धिजीवियों की पहचान

आक्रमणकारियों के बचाव में हमेशा गलत तथ्य पेश करना।

बाबर और इनके वंशज से लेकर तमाम लुटेरों का महिमामंडन करना।

आजादी की लड़ाई में गांधी और नेहरू की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना। वहीं, आजादी के लाखों दीवानों की शहादत पर मौनव्रत धारण कर लेना। तब भी गरम दल था। लाल-बाल-पाल,खुदीराम बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद सहित लाखों क्रांतिकारियों पर कोई लेखनी नहीं। इन सबके बारे में लिखा जाए तो पन्ने कम पड़ जाएंगे।

आजादी के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस और नेहरू की कृपा से एकतरफा लेखनी, देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के बारे में जानबूझकर गलत लेखनी कर पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना दिया।

महाराणा प्रताप, शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे जैसे नायकों के बारे में इतिहास के पाठ्यक्रमों में एकाध लाइन या पन्ने में निपटा देना, जबकि लुटेरों के महिमामंडन के लिए झूठे दस्तावेज को तैयार किया। अफगानिस्तान से आए लुटेरे बाबर के सेनापति द्वारा अयोध्या में राममंदिर को तोड़कर बनाये गये मस्जिद की असलियत पर मुंह में दही जमा लेना। 

1528से लेकर 2020 तक 432साल में लाखों साधु इस मंदिर को मलेच्छों से आजाद कराने के लिए शहीद हो गए।

सुभाषचंद्र बोस, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लालबहादुर शास्त्री, दीनदयाल उपाध्याय आदि नेताओं की रहस्यमयी मृत्यु पर चादर ओढ़कर घी पीना।

 चौरीचौरा में अंग्रेजों के अत्याचार पर चुप रहनेवाले ऐसे ही लोगों ने थाने को जलाने पर क्रांतिकारियों को अपराधी बताने के लिए कलम तोड़ दिया। इनकी नजर में जलने वाले सभी निर्दोष हिन्दुस्तानी थे। ओह, जिन पर इन तथाकथित निर्दोष सिपाहियों ने जुल्म किया था वो किस देश और समाज के थे। ये नहीं बताएंगे।

गोधरा में दंगे की बात को हाईलाइट करने वाले यही लोग 59 कारसेवकों को सुनियोजित तरीके से जिंदा जलाने की दुस्साहसिक और आतंकवादी घटना पर मुंह में दही जमा लेते हैं। बता दें कि गोधरा में ट्रेन में अयोध्या जा रहे 59 कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया था और इसकी तैयारी वहां के काग्रेस पार्षद के नेतृत्व में की गई थी, जिसकी गिरफ्तारी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार केंद्र में आने के बाद मुंबई से हुई। इतने सालों तक वह नाम बदलकर छुपता-फिरता रहा।

ठीक इसी तरह से नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ जेएनयू और अन्य वामपंथी संगठनों व बुद्धिजीवियों ने देशभर का माहौल दूषित किया, जबकि इस कानून का भारत के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं था। उमर खालिद, शरजिल इमाम से लेकर तमाम तथाकथित बुद्धिजीवियों ने भड़काऊ भाषण दिए।  अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप के दो दिवसीय भारत दौरे पर देश में दंगा फैलाने की सुनियोजित साजिश रची। इस पूरे धरना को पीपुल्स फोरम ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने फंडिंग की थी। आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली मे हुए दंगा में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उसके घर और आसपास की छतों पर पेट्रोल बम, तेजाब, पत्थर , गुलेल आदि पाए गए थे। ताहिर हुसैन खुद इसमें सक्रिय था। इंटेलिजेंस ब्यूरो के कॉन्स्टेबल अंकित शर्मा की चाकुओं से गोद कर हत्या कर  गंदे नाली में लाश फेंक दी गई,लेकिन किसी तथाकथित छद्मसेक्युलर को यहां कुछ भी गलत न मिला। इन सबने आग को भड़काने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। आज इन सभी के चेहरों से नकाब पूरी तरह से उतर चुका है।

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