हरेश कुमार
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एकतरफा नहीं होनी चाहिए। वामियों ने फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर दूसरों को कभी बोलने तक न दिया। आज जब अपनी बारी आई तो नौटंकी करने लगे। ओ वामियों आजादी के बाद से ही देश तुम्हारी एकतरफा मुस्लिम तुष्टिकरण और छद्मसेक्युलरिज्म की नीतियों को झेलता आ रहा है। ईसाई मिशनरियों को खुली छूट देकर धर्मांतरण का कारोबार करने वाले आज बिलबिला क्यों रहे हैं?कुछ तो ऐसा है,जिसकी पर्देदारी हो रही।
देश की आजादी में लाखों-करोड़ों लोगों ने अपनी-अपनी तरह से योगदान दिया, लेकिन सारा क्रेडिट गांधी और नेहरू को देकर दूसरों के बारे में कोई जानकारी देशवासियों को देने की जरूरत ही नहीं समझी। सुभाषचंद्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेताओं की रहस्यमयी मृत्यु पर चुप्पी साधने वाले आज कुछ ज्यादा ही चिंतित हैं।
आजादी के बाद से लाखों हिंदू मार दिये गए,लेकिन किसी वामी ने इसे कभी मुद्दा नहीं बनाया। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में हिंदुओं और सिखों की कभी बड़ी आबादी थी। आज इन तीनों ही देश में हिंदुओं और सिखों की आबादी खत्म होने के कगार पर हैं। यह इन सबके लिए कभी मुद्दा नहीं बना।
1989-1990में कश्मीर में लाखों की संख्या में कश्मीरी पंडितों (हिंदुओं) का कत्लेआम हुआ,लेकिन यह तथाकथित निष्पक्ष मीडिया के लिए कोई खबर न बनी। कश्मीरी पंडितों की हत्या पर सभी शांति से अपनी मां की गोद में सोए थे, तब छद्मसेक्युलरिज्म और मुस्लिम तुष्टिकरण की समर्थक सरकार थी। किसी को कोई समस्या नहीं हुई।
स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट्स ऑफ इंडिया (सिमी) की गतिविधियों पर किसी को समस्या नहीं हुई।
नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ शाहीन बाग में 101दिन का प्रायोजित धरना और फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो दिवसीय भारत यात्रा पर सुनियोजित तरीके से दंगा कराने वाले उमर खालिद, शरजील ईमाम, ताहिर हुसैन जैसे लोग इनके प्यारे रहे। वहीं, आईबी के कॉन्स्टेबल की चाकुओं से गोदकर हत्या और गंदे नाली में फेंके जाने पर वामी अपने अब्बू की गोद में सोए रहे। यह खबर वामियों के लिए चिंता की बात नहीं थी। ऐसे तथाकथित परगतिशील शुतुरमुर्गी बुद्धिजीवी आज भी अपने एजेंडे पर कायम हैं।
महाराष्ट्र के पालघर में निर्दोष साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या पर कोई आवाज नहीं आई। यह मॉब लिंचिंग में नहीं आता। हथियारबंद पुलिसकर्मियों के सामने निर्दोष साधुओं और ड्राइवर की हत्या पर एजेंडाधारी वामियों ने कोई आवाज नहीं निकाली।
दिशा सालियान और सुशांत सिंह राजपूत की हत्या को आत्महत्या में बदलने की महाराष्ट्र सरकार की सुनियोजित चाल पर चहुंओर शांति थी।
अर्णब गोस्वामी के साथ महाराष्ट्र सरकार के एकतरफा व्यवहार पर चुटकी लेनेवाले आज परेशान से हैं।
कंगना रनोट का घर तोड़े जाने पर इन सबने तालियां बजाईं थीं।
फ्रीडम ऑफ स्पीच का नारा एकतरफा नहीं होता दोस्त।
#FreedomofSpeech #अभिव्यक्तिकीस्वतंत्रता

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