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शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

किसान आंदोलन के नाम पर जिस दिन शाहीन बाग में धरना देने वाला गिरोह शामिल हुआ उसी दिन से ये आंदोलन दिशाहीन हो चुका था

हरेश कुमार



दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ 101दिन धरना देकर दिल्ली और एनसीआर के लोगों को रुलाने वाले और फिर दिल्ली में सुनियोजित दंगा कराने वाली जमात योगेंद्र यादव और वामी एंड कठमुल्ला ब्रिगेड ने जिस दिन एंट्री की, उसी दिन से इस आंदोलन पर सवाल खड़ा हो गया था। किसानों के नाम पर खालिस्तानी और अन्य ने पहले दिन से ही इसे हाईजैक कर लिया था।

वामपंथी कुत्ते की दुम हो चुके हैं। ये कभी सीधे नहीं हो सकते। छद्मसेक्युलरिज्म और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों के कारण आज देशभर में लात खा रहे हैं। एक खबर पर हुआं-हुआं करना और दूसरी पर मां की गोद में सो जाना इनकी पहचान बन चुकी है। इन सबको लगता है कि इनसे होशियार, बुद्धियार कोई नहीं। यह सब हिन्दुस्तान में इसलिए चल पाता है, क्योंकि सनातन हिंदू धर्म सहिष्णु है, वरना इतिहास उठाकर देखिए 57मुस्लिम देशों में कहीं भी आपको कम्युनिस्ट (वामपंथी) नहीं मिलेंगे और वामपंथियों के देश में मुस्लिम। सारी धमाचौकड़ी सिर्फ हिन्दुस्तान में ही चलती है। बगल के चीन में ही उईगर मुसलमानों को न दाढ़ी रखने की इजाजत है और न नमाज पढ़ने की। इनके मस्जिदों को चीन की सरकार ने तोड़वाकर वहां सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करा दिया है। इसके बावजूद भारत के हर मसलों पर हिंदू-मुस्लिम करनेवाले वामपंथी, पाकिस्तान,मिस्र,मलेशिया, सऊदी अरब के नेताओं के मुंह में दही जमा है। एक शब्द नहीं निकलता, सारी गलथेथरी हिन्दुस्तान में ही चलती है। इन सबको तबीयत से कूटने की जरूरत है।

किसी भी वामपंथी ने कभी भी पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर हुए अत्याचार पर एकबारगी मुंह नहीं खोला।
भारत में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की कृपा से इन सभी ने भारत के इतिहास और संस्कृति का गलत चित्रण किया। इनको पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना दिया।
आक्रमणकारियों को भारत का भाग्य विधाता बनाने वाले वामियों को कांगियों का पूरा समर्थन था,क्योंकि कांगियों और वामियों की नीति एक ही थी -मुस्लिम तुष्टिकरण और छद्मसेक्युलरिज्म।
इन सबने ईसाई मिशनरियों को देश के सुदूरवर्ती और पिछड़े इलाकों में धर्म परिवर्तन की खुली छूट दी। शिक्षा, चिकित्सा और पैसे की आड़ में ईसाई मिशनरियों ने एक बड़ी आबादी का धर्मांतरण करा दिया। अगर, कहीं कुछ कमी थी तो उसके विकास की जिम्मेदारी भारत सरकार और राज्य सरकारों की थी,लेकिन सभी ने अपने निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण पर शुतुरमुर्गियों की तरह चुप्पी साध ली। हर ओर शांति थी। सबकुछ मजे से हो रहा था। वहीं, दूसरी ओर इन सबके खिलाफ हिन्दुस्तान का आम आदमी तेजी से एकजुट हो रहा था और यही कारण है कि आज कांगी-वामी कहीं नहीं हैं।
आजादी के समय से ही वामियों ने एकतरफा लेखनी से देश के इतिहास को बदलने का काम किया। आज सोशल मीडिया के कारण इन सबके चेहरों से नकाब उतर चुका है। 2014में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बनने के बाद से ही कांगियों-वामियों और कठमुल्लों को हर बात में रोते देखेंगे।
वहीं, दूसरी तरफ कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हिन्दुस्तान की जनता इन कांगियों-वामियों-कठमुल्लों को गली के कुत्तों की तरह रगेद-रगेद कर भगा रही है। जैसे कुत्ते भौंकते हैं, ठीक उसी तरह से ये सब बिलबिला रहे हैं।
सुभाषचंद्र बोस, लालबहादुर शास्त्री, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय की हत्या पर किसी वामपंथी ने कभी भी आंसू नहीं बहाये।
कश्मीर से लाखों हिंदुओं को भगाये जाने, उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार करने, जिंदा जलाने, आरी से काटने पर भी इन कांगियों-वामियों को कुछ न दिखा।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर बने मंदिर को आक्रमणकारी बाबर के सेनापति द्वारा तोप से तोड़कर वहां मस्जिद बनाने की घटना पर कांगियों- वामियों ने या तो चुप्पी साध ली या देश को झूठी जानकारी दी।
बाबर के ही वंशज औरंगजेब द्वारा देशभर के हजारों हजार मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाने की जानकारी देशवासियों से छुपा ली। काशी, मथुरा, भोजशाला जैसे बड़े मंदिरों के अलावा कम से कम साठ हजार मंदिरों को तोड़ा गया था।
बलपूर्वक हिंदुओं को मुस्लिम धर्म स्वीकार करने को मजबूर किया गया। तभी गुरु नानक और उनके अनुयायियों द्वारा सिख धर्म की स्थापना हुई,जिसने इन मलेच्छों का खुलकर विरोध किया और सनातन धर्म की लाज रख ली।

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