हरेश कुमार
मोदी और योगी की दोहरी चुनावी सफलता से विपक्षी पार्टियों को कबाछ लग गया है, सरकार के हर कदम का अंध विरोध करना अपना धर्म समझने लगे हैं। चाहे भले ही देश में आग लग जाए, विपक्षी पार्टियों के नेताओं का एकमात्र मकसद अपने समर्थकों को उकसाकर देशविरोधी दंगे कराना, हिंसक माहौल बनाकर विदेशों में भारत की छवि को नुकसान पहुंचाना रह गया है।
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के दोबारा सत्तारूढ़ होने के बाद से इस देश के एक खास तबके और उनको अपना वोट बैंक मानने वाली पार्टियों को कबाछ लग गया है। उन्हें सरकार द्वारा लाए गए हर सुधार में कमी ही दिखती है। अच्छाई दिखने का नाम ही नहीं होता। आप कोई भी मुद्दा उठाकर देख लें, हर सुधार में कुछ न कुछ कमी निकाल ही देंगे।
बता दें कि कबाछ एक देशी पौधा होता है, जो शरीर के किसी हिस्से में छू जाए या छुआ दिया जाए तो लंबे समय तक खुजली होती रहती है। इसका निदान गाय का गोबर स्नान ही है। शरीर के जिस हिस्से में कबाछ लगा है उस हिस्से पर लगातार गोबर मलने से राहत मिलती है।
वर्तमान केंद्र की भाजपा सरकार के अंध विरोध की शुरुआत तीन तलाक पर कानून बनाने, कश्मीर से आर्टिकल 370 और अनुच्छेद 35 ए हटाने, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की राह में हर बाधा को दूर करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से निर्माण का रास्ता साफ होने के बाद से शुरू हुई। नागरिकता संशोधन कानून तो एक बहाना था, दर्द तो तीन तलाक, कश्मीर से आर्टिकल 370 और अनुच्छेद 35 ए का हटना औऱ अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने की टीस थी।
शुरू में केंद्र सरकार भी यहां चूक गई औऱ विरोध करने वालों पर सख्ती से कार्रवाई नहीं की। सरकार की मंशा वही जाने। इसका नतीजा यह हुआ कि विरोधियों का मनोबल बढ़ता गया। जामिया नगर के शाहीन बाग में जेएनयू, जामिया मिया यूनिवर्सिटी से लेकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी व अन्य वामपंथी और मुस्लिमों के वर्चस्व वाली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने समाज के एक खास तबके को उकसाना शुरू कर दिया था। इस कार्य के लिए ऐसे समाजविरोधी तत्वों को विदेशों से जमकर फंडिंग मिली।
जम्मू-कश्मीर में कार्यरत पाकिस्तान परस्त आतंकी संगठनों से लेकर प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के नए रूप पीपुल्स फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की छात्र इकाई से लेकर अन्य संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें जेएनयू के शरजील इमाम से लेकर उमर खालिद तक कई नाम उभरे, जिन्होंने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो दिवसीय भारत आगमन पर दिल्ली को सुनियोजित तरीके से दंगों की आग में झोंक दिया, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश और मोदी सरकार की किरकिरी हो और इस काम में ऐसे तत्व काफी हद तक सफल रहे। दंगे की शुरुआत के दो दिनों तक सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ रही। आखिर में मोर्चा संभाला, तब तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आगजनी और हिंसा से हजारों करोड़ की संपत्ति का नाश हो गया और 53 लोग मौत की भेंट चढ़ गए थे। इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो के कॉन्स्टेबल रहे अंकित शर्मा की चाकुओं से गोदकर की गई हत्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस हत्या में आम आदमी पार्टी के तत्कालीन पार्षद ताहिर हुसैन का नाम आया, जो अभी जेल में है।
इसके कुछ दिनों बाद ही सरकार ने कृषि कानून पर तीन बिल लाया। सरकार किसानों को उनके द्वारा पैदा किए गए अनाज के बदले बेहतर मूल्य दिलाने के लिए प्रतिबद्ध थी और इस बिल के द्वारा किसानों को यह छूट दी गई थी कि वो जहां चाहे अपनी फसल को बेहतर दाम पर बेच सकते हैं। इतनी सी बात पंजाब और हरियाणा के कृषि मंडियों पर कब्जा जमाए आढ़तियों औऱ बिचौलियों को खल गई। खलती भी क्यों न, इन सबकी आदमनी के मूल स्रोत पर ही सरकार चोट कर रही थी। फिर, क्या था। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा जल उठा और इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पंजाब को अलग राज्य बनाने की मंशा पाले खालिस्तानियों ने। इन सबने तथाकथित किसान आंदोलन के दौरान लालकिला पर भारतीय तिरंगा से ऊंचा खालिस्तानी झंडा फहराया। वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों के साथ मारपीट की। सरकार ने तब भी धैर्य का परिचय दिया। इससे इन सबका हौसला बढ़ता ही गया। तथाकथित किसान बिल के विरोध में इन सबने गुंडागर्दी की तमाम सीमाएं पार कर दी। इस आग को भी विरोधियों ने खूब भड़काया। उन्हें तो बस सरकार के विरोध से मतलब था।
एक चैनल पर बात करते हुए तथाकथित किसान आंदोलन के नेता योगेंद्र यादव ने कहा था कि हमने तो अच्छी पिच तैयार की थी, हमने हमारा काम कर दिया था, बाकी काम राजनीतिज्ञों का है। इस विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते हुए दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों को फ्री बिजली, फ्री पानी और वाई-फाई की सुवधियाएं मुहैया कराई थी। इसका परिणाम पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के रूप में सामने आया। आज पंजाब की स्थिति कैसी है, यह दुनिया से छुपी नहीं है। आए दिन हत्याकांड और आगजनी व खालिस्तान समर्थन के नारे लगना आम बात हो चुकी है।
सरकार ने पंजाब चुनाव को देखते हुए दबाव में आकर तमाम खूबियों के बावजूद किसान बिल वापस ले लिया। इन सबके बावजूद भाजपा को इसका कोई चुनावी लाभ नहीं मिला। उलटे इन लोगों ने उत्तर प्रदेश के ळखीमपुर खीरी में हिंसा व आगजनी कर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने की पुरजोर कोशिश की थी। समय रहते केंद्र और राज्य सरकार ने स्थिति पर काबू पा लिया, वरना इन सबकी मंशा सही नहीं थी।
किसान आंदोलन के बाद देश में अभी कुछ दिनों से शांति थी। फिर, वाराणसी में ज्ञानवापी मंदिर का मसला सामने आ गया। वहां कोर्ट के द्वारा नियुक्त कमीशन को वीडियोग्राफी के दौरान ज्ञानवापी परिसर स्थित कुंड में शिवलिंग मिला। उसके बाद माहौल गर्म होना ही था और वही हुआ जिसका डर था। कुछ ही दिनों बाद एक टीवी चैनल पर डिबेट के दौरान भाजपा की तत्कालीन रष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने उनके आराध्य शिव के बारे में उलटी-सीधी बातें कहे जाने पर मुस्लिमों के पैगंबर मुहम्मद पर एक टिप्पणी कर दी। इसी टिप्पणी पर भाजपा के दिल्ली मीडिया प्रभारी नवीन जिंदल ने ट्विटर पर टिप्पणी करते हुए ट्वीट कर दिया। इसके बाद पूरे देश में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। भाजपा ने तत्काल कार्रवाई करते हुए नूपुर शर्मा को उनके पद से हटाते हुए पार्टी से छह साल के लिए निलंबित कर दिया तथा नवीन जिंदल को पार्टी से धह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बावजूद मुस्लिम पक्ष की ओऱ से नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल को जान से मारने की धमकी दी जाने लगी। दोनों ने सरकार औऱ पुलिस से अपनी सुरक्षा की मांग की। जुमे की नमाज के बाद देश के कई जगहों पर आगजनी औऱ हिंसा की गई। कानपुर, प्रयागराज, मुरादाबाद औऱ रांची सहित कई शहरों में दंगाइयों ने उग्र रूप धारण कर लिया था। पुलिस औऱ प्रशासन ने शांति से इस पर काबू किया।
यह सब अभी चल ही रहा था कि सरकार ने पाकिस्तान औऱ चीन के साथ सीमा पर
चल रहे विवाद को देखते हुए सेना में चार साल की बहाली को घोषणा की और इसे अग्निवीर
नाम दिया। सरकार की ओऱ से कहा गया कि अग्निवीरों को चार साल के बाद भी अन्य सेवाओं
में प्राथमिकता दी जाएगी और अगर ड्यूटी के दौरान मृत्यु होती है तो परिवार को उचित
मुआवजा दिया जाएगा। चार साल के बाद 25 प्रतिशत लोगों को सेना में रेग्युलर भर्ती
में शामिल किया जाएगा और बचे 75 प्रतिशत लोगों को उनके हायर एजुकेशन से लेकर अन्य
इच्छित स्वरोजगार के कार्यों में सरकार की ओर से मदद दी जाएगी। विपक्षी पार्टियों
को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया। इन सबने इसे मुद्दा बनाकर युवाओं को भड़काना
शुरू कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि कई राज्यों में अग्निवीरों की बहाली के
खिलाफ उग्र धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। इसमें बिहार का नाम सबसे आगे चल रहा है।
बिहार के कई शहरों में सेना में भर्ती की इच्छा लिए युवाओं ने रेल पटरियों और हाईवे
को जाम करने से लेकर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। कई जगह
तो हिंसक प्रदर्शन ने कड़ा रूप ले लिया है। इन सबका गुस्सा भाजपा के खिलाफ ज्यादा
है। भाजपा के कई नेताओं के आवास पर तोड़फोड़ और आगजनी की कोशिश की गई है। सरकार को
चाहिए कि इन युवाओं को भड़काने वाले असमाजिक तत्वों, विपक्षी पार्टियों को सीधा
संदेश दे, ताकि ऐसे लोग युवाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा न कर सकें। इस तरह की
हिंसा से किसी का भला नहीं होता है। हां, देश की संपत्ति का काफी नुकसान हो जाता
है और सेना में भर्ती की इच्छा लिए युवाओं को भी इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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